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Yugvarta
, Mar 05, 2025 11:51 PM 0 Comments
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हर्षिल-मुखबा, उत्तरकाशी :
-प्रखर प्रकाश मिश्रा
हर्षिल (उत्तरकाशी), 5 मार्च : हर्षिल उत्तरकाशी मुखबा की घाटियाँ, हरि वादियाँ और बर्फ से लक-दक हिमालय की चोटियाँ आदि काल से ही मानव को अपनी ओर आकर्षित करती रहीं हैं, इसकी नैसर्गिक सुंदरता में मानव ने ईश्वर से साक्षात्कार करने के लिए तपस्यायें भी की हैं और कुछ ने इन रमणियें मनोरम स्थलों में अपनी एक अलग दुनिया बसायी, ऐसी ही एक कहानी हम आपके लिए लाए हैं, जिसमें एक भगौड़े अंग्रेज़ सैनिक ने हर्षिल का राजा बन कर राज किया और यहाँ व्यापार भी किया और यहीं का बन कर रह गया।
यह कहानी है 19वीं शताब्दी की शुरुआत की जब फ्रेडरिक ई. विल्सन, जिन्हें हर्षिल के स्थानीय लोग “राजा हुलासिंह” कहकर बुलाते थे, में इस क्षेत्र में आए थे। फ्रेडरिक ई. विल्सन के आने की सही समयरेखा स्पष्ट नहीं है, लेकिन ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, उन्होंने 1830 के दशक में हर्षिल में अपना प्रभाव जमाया और 1883 में अपनी मृत्यु तक इस क्षेत्र में शक्तिशाली बने रहे। विल्सन ने इस इलाके में न केवल अपना प्रभुत्व स्थापित किया, बल्कि हिमालय के देवदार पेड़ों के व्यापार से अपार संपत्ति भी अर्जित की। उसकी ताकत इतनी बढ़ गई कि टिहरी गढ़वाल के राजा का भी उस पर कोई नियंत्रण नहीं रह गया।
विल्सन का आगमन और शुरुआती सफर-
विल्सन ब्रिटेन में कहां का रहने वाला था और गढ़वाल कैसे पहुंचा, इस बारे में पक्की जानकारी उपलब्ध नहीं है। कहा जाता है कि वह ब्रिटिश सेना से भागकर यहां आया और गढ़वाल के दुर्गम क्षेत्र हर्सिल में अपनी दुनिया बसा ली। धीरे-धीरे उसने गांव में अपना प्रभाव बढ़ाया और पूरी तरह से वहीं का होकर रह गया।
हिरणों का शिकार और लकड़ी का व्यापार-
शुरुआत में विल्सन ने हिरणों का शिकार कर उनकी खाल और कस्तूरी को लंदन भेजना शुरू किया। इस काम में उसने कुछ स्थानीय ग्रामीणों को भी शामिल किया और उन्हें शिकार तथा व्यापार के गुर सिखाए। बाद में उसकी नजर हिमालय के घने देवदार के जंगलों पर पड़ी। उस समय भारत में रेलवे निर्माण के लिए भारी मात्रा में लकड़ी की जरूरत थी, और विल्सन ने इसी मौके को भुनाया।
उसने देवदार के पेड़ों को काटकर भागीरथी नदी की तेज धारा में बहाना शुरू किया, जिससे वे सीधे निचले इलाकों में पहुंच जाती थीं। वहां उसके लोग इन लकड़ियों को निकालकर ब्रिटिश सरकार को बेचते थे। यह तरीका इतना कारगर साबित हुआ कि जल्द ही विल्सन अपार धन-संपत्ति का मालिक बन गया।
टिहरी राजा से संधि और हर्सिल पर राज-
शुरुआत में विल्सन ने टिहरी-गढ़वाल के राजा से जंगल काटने की अनुमति नहीं ली थी, लेकिन बाद में उसे राजा को हिस्सा देकर यह अधिकार प्राप्त करना पड़ा। इसके बाद उसने जंगलों की अंधाधुंध कटाई शुरू कर दी और देखते ही देखते वह हर्सिल का सबसे शक्तिशाली व्यक्ति बन गया। उसकी संपत्ति और ताकत इतनी बढ़ गई कि टिहरी नरेश भी उस पर नियंत्रण नहीं रख सके।
विल्सन ने हर्षिल के लोगों को अपने अधीन कर लिया और वहां अपने मनमाने नियम लागू कर दिए। उसने न केवल खुद को वहां का राजा घोषित कर दिया, बल्कि अपनी मुद्रा भी चलवाई।
पारिवारिक जीवन और विरासत-
हर्षिल में रहते हुए विल्सन ने एक पहाड़ी महिला गुलाबी से विवाह किया और यहीं अपना परिवार बसाया। वह जीवनभर हर्षिल में ही राजा की तरह रहा।
विल्सन ने मसूरी में भी अपना रौब दाब जमा लिया। उसने वहां ‘चार्लीविला’ नाम का एक होटल बनवाया, जो आज लाल बहादुर शास्त्री प्रशासनिक अकादमी के रूप में जाना जाता है। मसूरी में ही उसकी कब्र भी स्थित है। ऐसा है हिमालय का आकर्षण, जो यहाँ आया वो यहीं का हो कर रह गया।