Uttarakhand : सरस्वती ताल और केदारताल के वैज्ञानिक सर्वेक्षण के लिए विशेषज्ञ दल रवाना

ग्लेशियर झीलों से संभावित जोखिमों के आकलन पर जोर, यूएसडीएमए समेत कई विशेषज्ञ संस्थानों के वैज्ञानिक अभियान में शामिल

YUGVARTA NEWS

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Lucknow, 8 Sep, 2026 07:34 PM
Uttarakhand : सरस्वती ताल और केदारताल के वैज्ञानिक सर्वेक्षण के लिए विशेषज्ञ दल रवाना

देहरादून, 8 सितंबर 2026। उत्तराखंड में ग्लेशियर झीलों से उत्पन्न होने वाले संभावित जोखिमों को कम करने और आपदा प्रबंधन की तैयारियों को और मजबूत करने के उद्देश्य से चमोली की सरस्वती ताल और उत्तरकाशी की केदारताल के वैज्ञानिक सर्वेक्षण के लिए विशेषज्ञ दल मंगलवार को रवाना हुआ। उत्तराखंड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (यूएसडीएमए) में सचिव आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास विनोद कुमार सुमन ने विशेषज्ञ दल को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास मंत्री मदन कौशिक ने अभियान के लिए दल को शुभकामनाएं दीं।

ग्लेशियर झीलों की स्थिति का होगा वैज्ञानिक आकलन

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि प्रदेश में संवेदनशील ग्लेशियर झीलों का व्यापक सर्वेक्षण और वैज्ञानिक अध्ययन कराया जा रहा है। इसके तहत झीलों की वर्तमान स्थिति, जलस्तर, आकार में होने वाले बदलाव, आसपास के भू-भाग और संभावित जोखिम वाले क्षेत्रों का आकलन किया जाएगा।

उन्होंने कहा कि संभावित खतरे की स्थिति में प्रभावित क्षेत्रों तक समय रहते चेतावनी पहुंचाना बेहद महत्वपूर्ण है। इसके लिए आधुनिक सेंसर, जलस्तर मापक उपकरण, संचार प्रणाली और अन्य आवश्यक तकनीकी संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित की जाएगी, ताकि संभावित आपदा की स्थिति में समय रहते प्रभावी कदम उठाए जा सकें।

13 संवेदनशील ग्लेशियर झीलें चिन्हित

सचिव आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास विनोद कुमार सुमन ने बताया कि उत्तराखंड में 13 ग्लेशियर झीलों को संवेदनशील श्रेणी में चिन्हित किया गया है। इनमें से चार झीलों का सर्वेक्षण पूरा किया जा चुका है, जबकि शेष संवेदनशील झीलों का भी चरणबद्ध तरीके से वैज्ञानिक सर्वेक्षण कराया जा रहा है।

इसी क्रम में सरस्वती ताल और केदारताल का बैथीमेट्री सर्वेक्षण करने के लिए विशेषज्ञ दल को रवाना किया गया है। सर्वेक्षण के दौरान दोनों झीलों की वर्तमान स्थिति, जलस्तर, संभावित जोखिम कारकों और डाउनस्ट्रीम क्षेत्रों पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों का अध्ययन किया जाएगा।

सुमन ने बताया कि सरस्वती ताल करीब 5,700 मीटर और केदारताल करीब 4,750 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। अत्यधिक ऊंचाई और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में स्थित इन ग्लेशियर झीलों का वैज्ञानिक अध्ययन आपदा जोखिम न्यूनीकरण की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

सुरक्षित निकासी और चेतावनी तंत्र मजबूत करने पर जोर

आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास मंत्री मदन कौशिक ने कहा कि ग्लेशियर झीलों से संभावित आपदा के प्रभाव को कम करने के लिए आवश्यक सुरक्षात्मक और जोखिम न्यूनीकरण उपायों पर काम किया जा रहा है।

उन्होंने कहा कि संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान के साथ आपदा की स्थिति में सुरक्षित निकासी मार्ग, संभावित प्रभावित क्षेत्रों का चिन्हांकन, संचार व्यवस्था और स्थानीय चेतावनी तंत्र को मजबूत किया जाएगा। राहत एवं बचाव की तैयारियों को भी प्रभावी बनाया जा रहा है।

कई विशेषज्ञ संस्थानों के विशेषज्ञ अभियान में शामिल

सर्वेक्षण अभियान में विभिन्न विशेषज्ञ संस्थानों और सुरक्षा बलों की संयुक्त भागीदारी सुनिश्चित की गई है। विशेषज्ञ दल में यूएसडीएमए, यूएलएमएमसी, बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय/संबंधित पुराविज्ञान विशेषज्ञ संस्थान, वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान, एनआईएच रुड़की, एसडीआरएफ, एनडीआरएफ और नेहरू पर्वतारोहण संस्थान के विशेषज्ञ शामिल हैं।

विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों की संयुक्त भागीदारी से ग्लेशियर झीलों की स्थिति, संभावित जोखिमों और डाउनस्ट्रीम क्षेत्रों पर पड़ने वाले प्रभाव का बहुआयामी वैज्ञानिक आकलन किया जाएगा।

अभियान दल में यूएसडीएमए से रोहित कुमार और निखिल पुनिया, यूएलएमएमसी से डॉ. विशाल और दीपक भट्ट, बीएसआईपी लखनऊ से डॉ. शेख नवाज अली, शुभजीत घोष और प्रकाश रंजन जेना, वाडिया संस्थान से डॉ. पिंकी बिष्ट, स्वप्निल बिष्ट और शिव्यांक सिंह नेगी, एनआईएच रुड़की से शिव शंकर यादव और डॉ. शिवानंद मंडराहा, एसडीआरएफ से नितेश खेतवाल और संदीप सिंह तथा एनडीआरएफ से सचिन कुमार और मनीष कुमार शामिल हैं।

इसके अलावा चमोली जनपद से महेंद्र और मनोज सिंह तथा उत्तरकाशी से डीडीएमओ शार्दुल गुसाईं और इंजीनियर नरेंद्र सिंह रावत भी दल का हिस्सा हैं।

इस अवसर पर राज्य सलाहकार समिति, आपदा प्रबंधन विभाग के उपाध्यक्ष विनय रुहेला, ले. कर्नल रघुवीर सिंह भंडारी (सेवानिवृत्त), एसीईओ क्रियान्वयन डीआईजी राजकुमार नेगी, जेसीईओ दिनेश कुमार पुनेठा सहित अन्य अधिकारी मौजूद रहे।

आदित्य अमिताभ त्रिवेदी, युगवार्ता

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