उत्तराखंड में कचरा प्रबंधन को मिलेगी नई रफ्तार, 500 वाहनों में चार कम्पार्टमेंट की व्यवस्था

1,930 मीट्रिक टन दैनिक कचरे में से 1,800 मीट्रिक टन का हो रहा प्रसंस्करण, दिसंबर 2026 तक लीगेसी वेस्ट के निस्तारण का लक्ष्य

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Lucknow, 9 Sep, 2026 02:50 PM
उत्तराखंड में कचरा प्रबंधन को मिलेगी नई रफ्तार, 500 वाहनों में चार कम्पार्टमेंट की व्यवस्था

देहरादून, 9 सितंबर। उत्तराखंड को स्वच्छ और कचरा-मुक्त बनाने की दिशा में राज्य सरकार ने ठोस अपशिष्ट प्रबंधन व्यवस्था को और प्रभावी बनाने की तैयारी तेज कर दी है। इसके तहत ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम-2026 के प्रभावी क्रियान्वयन, कचरे के स्रोत पर पृथक्करण, वैज्ञानिक निस्तारण और रिसाइक्लिंग पर विशेष जोर दिया जा रहा है।

बुधवार को सचिवालय स्थित मीडिया सेंटर में राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सदस्य सचिव डॉ. पराग मधुकर धकाते ने ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम-2026 को लेकर प्रेस कॉन्फ्रेंस की। उन्होंने बताया कि ये नए नियम 1 अप्रैल 2026 से देशभर में लागू हैं और इनके प्रभावी क्रियान्वयन के लिए उत्तराखंड के शहरी एवं ग्रामीण स्थानीय निकायों में व्यापक स्तर पर तैयारियां की जा रही हैं।

चार श्रेणियों में होगा कचरे का पृथक्करण

डॉ. धकाते ने बताया कि वर्ष 2016 के नियमों में कचरे के पृथक्करण के लिए तीन श्रेणियां निर्धारित थीं, जबकि नए नियमों के तहत कचरे को चार श्रेणियों में अलग करने का प्रावधान किया गया है। इनमें गीला कचरा, सूखा कचरा, सैनिटरी कचरा और विशेष देखभाल वाला कचरा शामिल हैं।

नए नियमों के तहत 2,000 वर्ग मीटर से अधिक क्षेत्रफल, प्रतिदिन 40 हजार लीटर से अधिक जल खपत या प्रतिदिन 100 किलोग्राम से अधिक ठोस कचरा उत्पादन करने वाले प्रतिष्ठानों में से किसी एक मानक को पूरा करने वाले संस्थान बल्क वेस्ट जनरेटर की श्रेणी में आएंगे। ऐसे प्रतिष्ठानों के पंजीकरण के साथ ही उनके स्तर पर कचरे के प्रसंस्करण और रिसाइक्लिंग की जिम्मेदारी भी निर्धारित की गई है।

हर जिले में गठित किए गए डिस्ट्रिक्ट स्पेशल सेल

डॉ. धकाते के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट के 19 फरवरी 2026 के निर्देशों के क्रम में प्रदेश में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन व्यवस्था की निगरानी को मजबूत करने के लिए प्रत्येक जिले में डिस्ट्रिक्ट स्पेशल सेल गठित किए गए हैं। ये सेल शहरी और ग्रामीण स्थानीय निकायों में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन, डंपिंग साइट तथा पुराने जमा कचरे यानी लीगेसी वेस्ट के निस्तारण की लगातार निगरानी कर रहे हैं।

राज्य में लीगेसी वेस्ट के निस्तारण को दिसंबर 2026 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। अधिकारियों के मुताबिक प्रदेश में वर्तमान में लगभग शत-प्रतिशत डोर-टू-डोर कचरा संग्रहण किया जा रहा है।

500 वाहनों में चार कम्पार्टमेंट की व्यवस्था

चार श्रेणियों में कचरे के पृथक्करण को प्रभावी बनाने के लिए करीब 500 कचरा संग्रहण वाहनों में चार अलग-अलग कम्पार्टमेंट की व्यवस्था की जा रही है। इसके अलावा कचरा संग्रहण वाहनों की निगरानी और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए डिजिटल व्हीकल ट्रैकिंग सिस्टम भी लागू किया गया है।

राज्य में कचरा संग्रहण व्यवस्था को और मजबूत करने के लिए 657 नए वाहन खरीदे जा रहे हैं, जिनमें लगभग 480 ई-वाहन शामिल हैं। इससे कचरा संग्रहण व्यवस्था को अधिक व्यवस्थित और पर्यावरण के अनुकूल बनाने में मदद मिलने की उम्मीद है।

रोजाना 1,930 मीट्रिक टन कचरा, 1,800 मीट्रिक टन का प्रसंस्करण

प्रेस कॉन्फ्रेंस में दी गई जानकारी के अनुसार उत्तराखंड में प्रतिदिन करीब 1,930 मीट्रिक टन ठोस कचरा उत्पन्न हो रहा है। इसमें से लगभग 1,800 मीट्रिक टन कचरे का प्रतिदिन प्रसंस्करण किया जा रहा है। प्लास्टिक कचरे के प्रसंस्करण के लिए भी पृथक व्यवस्था की गई है।

राज्य में फिलहाल 22 इंटीग्रेटेड सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट, करीब 50 मैटेरियल रिकवरी फैसिलिटी (MRF) और 600 से अधिक वेस्ट कम्पोस्टर संचालित किए जा रहे हैं।

सर्कुलर इकोनॉमी और रिसाइक्लिंग पर फोकस

नए नियमों में केवल कचरे के निस्तारण तक सीमित रहने के बजाय सर्कुलर इकोनॉमी, रिसाइक्लिंग और संसाधनों के पुनः उपयोग को भी प्राथमिकता दी गई है। इसका उद्देश्य कचरे को समस्या के बजाय दोबारा उपयोग किए जा सकने वाले संसाधन के रूप में विकसित करना है।

अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि ठोस अपशिष्ट प्रबंधन व्यवस्था को सफल बनाने के लिए केवल सरकारी तंत्र की कार्रवाई पर्याप्त नहीं है। इसके लिए नगरीय निकायों, ग्राम पंचायतों, जिला प्रशासन, राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और आमजन की सामूहिक भागीदारी जरूरी है।

प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान सहायक निदेशक, पीआईबी देहरादून संजीव सुन्दिरयाल और निदेशक शहरी विकास प्रवीण कुमार भी मौजूद रहे।

आदित्य अमिताभ त्रिवेदी, युगवार्ता

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