बायो इंडिकेटर प्रोजेक्ट से पता चलेगी सोंग नदी की सेहत, SARRA ने शुरू किया वैज्ञानिक अध्ययन

80 किलोमीटर के नदी क्षेत्र में 36 स्थानों पर होगा सर्वेक्षण, पांच प्रमुख जीव-समूहों के जरिए परखी जाएगी पारिस्थितिकी की स्थिति

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Lucknow, 4 Nov, 2026 12:42 PM
बायो इंडिकेटर प्रोजेक्ट से पता चलेगी सोंग नदी की सेहत, SARRA ने शुरू किया वैज्ञानिक अध्ययन

देहरादून। पूर्वी दून घाटी की प्रमुख जीवनरेखा मानी जाने वाली सोंग नदी के पारिस्थितिक स्वास्थ्य, जल गुणवत्ता और जैव विविधता का वैज्ञानिक आकलन करने की दिशा में उत्तराखंड सरकार ने महत्वपूर्ण पहल की है। स्प्रिंग एंड रिवर रिजुविनेशन अथॉरिटी (SARRA) के तहत सोंग नदी क्षेत्र में ‘बायो इंडिकेटर प्रोजेक्ट’ शुरू किया गया है। इस अध्ययन के माध्यम से नदी और उसके आसपास के प्राकृतिक पर्यावरण की वास्तविक स्थिति का आकलन जैविक संकेतकों (बायो इंडिकेटर्स) के आधार पर किया जाएगा।

इस छह महीने की परियोजना का मुख्य उद्देश्य नदी के जल की गुणवत्ता, नदी तट के प्राकृतिक आवासों तथा मानवीय गतिविधियों से पड़ने वाले प्रभावों का वैज्ञानिक अध्ययन करना है। भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) के पूर्व वरिष्ठ प्राध्यापक एवं वैज्ञानिक ‘जी’ डॉ. वी.पी. उनियाल के मार्गदर्शन में यह शोध कार्य संचालित किया जाएगा।

पांच प्रमुख जीव-समूहों से होगी नदी की पारिस्थितिकी की जांच

परियोजना के अंतर्गत पांच प्रमुख जैविक समूहों को अध्ययन का आधार बनाया गया है। इनकी मौजूदगी, विविधता और संख्या के विश्लेषण से नदी तथा उसके आसपास के पर्यावरण की स्थिति का पता लगाया जाएगा।

इनमें जलीय मैक्रोइनवर्टेब्रेट्स यानी पानी में पाए जाने वाले छोटे अकशेरुकी जीव और उनके लार्वा शामिल हैं। ये जीव जल प्रदूषण के प्रति संवेदनशील होते हैं और पानी की गुणवत्ता के महत्वपूर्ण संकेतक माने जाते हैं।

इसके अलावा तितलियों और जंगली मधुमक्खियों का अध्ययन किया जाएगा, जिनसे नदी तट पर वनस्पतियों, हरियाली और परागण की स्थिति का आकलन करने में मदद मिलेगी। ड्रैगनफ्लाई और डेम्सलफ्लाई (ओडोनाटा) की प्रजातियां जल की गुणवत्ता तथा नदी किनारे के प्राकृतिक आवासों की स्थिति समझने में सहायक होंगी।

वहीं, पक्षियों की विभिन्न प्रजातियों का सर्वेक्षण नदी घाटी के व्यापक पारिस्थितिक स्वास्थ्य और जैव विविधता की स्थिति का आकलन करने के लिए किया जाएगा।

80 किलोमीटर क्षेत्र में 36 स्थानों पर होगा सर्वेक्षण

इस अध्ययन का दायरा सोंग नदी के उद्गम स्थल कद्दूखाल (टिहरी) से लेकर गंगा नदी के साथ उसके संगम स्थल तेहरी फार्म (देहरादून) तक लगभग 80 किलोमीटर का होगा।

वैज्ञानिक अध्ययन को व्यवस्थित तरीके से संचालित करने के लिए नदी क्षेत्र को तीन हिस्सों में विभाजित किया गया है। इनमें ऊपरी क्षेत्र (अपर जोन), मध्य क्षेत्र (मिडिल जोन) और निचला क्षेत्र (लोअर जोन) शामिल हैं।

प्रत्येक क्षेत्र में 12 स्थायी सैंपलिंग स्टेशन स्थापित किए जाएंगे। इस प्रकार तीनों क्षेत्रों में कुल 36 स्थानों पर नियमित सर्वेक्षण किया जाएगा। अध्ययन के दौरान नवंबर से अप्रैल के बीच मानसून के बाद और मानसून से पहले की परिस्थितियों में फील्ड सर्वे किया जाएगा, ताकि अलग-अलग मौसमों में नदी की पारिस्थितिकी में होने वाले बदलावों को समझा जा सके।

सोंग बांध और शहरीकरण के प्रभावों के आकलन में मिलेगी मदद

परियोजना के तहत तैयार होने वाला व्यापक वैज्ञानिक डेटाबेस सोंग नदी के वर्तमान पारिस्थितिक स्वास्थ्य का आधारभूत रिकॉर्ड (बेसलाइन डेटा) उपलब्ध कराएगा। इससे भविष्य में नदी की स्थिति में होने वाले बदलावों की तुलना और निगरानी करना आसान होगा।

विशेष रूप से प्रस्तावित सोंग बांध, नदी क्षेत्र में खनन गतिविधियों और तेजी से बढ़ते शहरीकरण के संभावित प्रभावों का आकलन करने में यह अध्ययन महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

इस शोध से प्राप्त वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर नदी के संरक्षण, जैव विविधता के संवर्धन और नदी तटीय पारिस्थितिकी तंत्र के पुनर्जीवन के लिए प्रभावी नीतियां तैयार करने में मदद मिलेगी। यह पहल सोंग नदी के दीर्घकालिक संरक्षण और पूर्वी दून घाटी के पर्यावरणीय संतुलन को बनाए रखने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।

आदित्य अमिताभ त्रिवेदी, युगवार्ता

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