उत्तराखंड की लोकभाषाओं को डिजिटल पहचान दिलाएगा ‘भाषा एआई’, सीएम धामी ने वॉइस कलेक्शन पोर्टल का किया शुभारंभ
गढ़वाली, कुमाऊँनी और जौनसारी भाषाओं के संरक्षण के लिए आधुनिक तकनीक का सहारा; मुख्यमंत्री की कुमाऊँनी वॉइस क्लिप से शुरू हुआ अभियान
YUGVARTA NEWS
Lucknow, 22 Oct, 2026 02:34 PMदेहरादून, 22 अक्टूबर। उत्तराखंड की समृद्ध लोकभाषाओं को डिजिटल मंच पर नई पहचान दिलाने और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के माध्यम से उनके संरक्षण एवं संवर्धन की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल की गई है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने गुरुवार को मुख्यमंत्री कैंप कार्यालय में एआई स्ट्रैटेजिक इंजीनियरिंग (AiSE) फाउंडेशन की ‘भाषा एआई’ पहल के तहत गढ़वाली, कुमाऊँनी और जौनसारी लोकभाषाओं के वॉइस कलेक्शन पोर्टल का शुभारंभ किया। अभियान की शुरुआत मुख्यमंत्री की कुमाऊँनी भाषा में रिकॉर्ड की गई वॉइस क्लिप के साथ हुई।
इस पहल का उद्देश्य उत्तराखंड की स्थानीय भाषाओं के शब्दों, उच्चारणों और बोलने की विभिन्न शैलियों का डिजिटल संग्रह तैयार करना है, ताकि भविष्य में एआई आधारित तकनीक इन भाषाओं को बेहतर ढंग से समझ सके और इनके माध्यम से संवाद करने में सक्षम हो सके।
लोकभाषाएं हमारी पहचान, इनके संरक्षण में तकनीक की अहम भूमिका: धामी
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि बोली-भाषाएं हमारी सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। अपनी पहचान को बनाए रखने और लोककला, संस्कृति तथा परंपराओं के संरक्षण के लिए आधुनिक तकनीक का उपयोग आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है और आने वाले समय में इसका दायरा और व्यापक होगा। ऐसे में उत्तराखंड की क्षेत्रीय भाषाओं को भी इस तकनीक के अनुरूप विकसित करना जरूरी है, जिससे राज्य की समृद्ध भाषाई विरासत को राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर पहचान मिल सके।
मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य सरकार का प्रयास है कि दूरदराज के गांवों में रहने वाले लोग भी अपनी स्थानीय बोली में सरकारी योजनाओं की जानकारी प्राप्त कर सकें और अपनी समस्याओं एवं सुझावों को आसानी से सरकार तक पहुंचा सकें। इसके लिए एआई तकनीक का स्थानीय भाषाओं और उनके विशिष्ट उच्चारणों को समझना जरूरी है।
शब्दों के साथ उच्चारण और बोलने की शैली का भी होगा संग्रह
मुख्यमंत्री ने कहा कि किसी भाषा को सही ढंग से समझने के लिए केवल शब्दों का संग्रह पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनके सही उच्चारण, बोलने के तरीके और क्षेत्रीय विविधताओं को भी दर्ज करना आवश्यक है। उत्तराखंड के विभिन्न क्षेत्रों में कई शब्दों का उच्चारण अलग-अलग ढंग से किया जाता है। ऐसे में वॉइस कलेक्शन पोर्टल के माध्यम से प्राप्त जानकारी एआई को इन भाषाई विविधताओं को समझने में मदद करेगी।
उन्होंने विश्वास जताया कि यह पहल गढ़वाली, कुमाऊँनी और जौनसारी लोकभाषाओं के संरक्षण के साथ ही नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों, लोककला और परंपराओं से जोड़ने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। मुख्यमंत्री ने इस अभियान से जुड़े सभी लोगों को शुभकामनाएं दीं।
लोकभाषाओं की मौलिकता बनाए रखने में सहयोग करेगी जागर अकादमी
इस अवसर पर पद्मश्री सम्मानित लोकगायक प्रीतम भरतवाण ने कहा कि उत्तराखंड की लोकभाषाओं में यहां के लोकजीवन, लोकगीतों, जागर और सांस्कृतिक परंपराओं की समृद्ध विरासत समाहित है। उन्होंने बताया कि जागर अकादमी इस पहल में स्थानीय भाषाओं के सही उच्चारण और उनकी मौलिकता को बनाए रखने के लिए सहयोग करेगी।
वहीं, एआईएसई फाउंडेशन के संस्थापक सचिदानंद सेमवाल ने बताया कि ‘भाषा एआई’ पहल के अंतर्गत गढ़वाली, कुमाऊँनी और जौनसारी भाषाओं के शब्दों एवं आवाजों का संग्रह तैयार किया जा रहा है। इसका लक्ष्य भविष्य में एआई आधारित तकनीक को इन भाषाओं में संवाद करने में सक्षम बनाना है।
कार्यक्रम में शक्ति प्रसाद भट्ट, गजेंद्र नौटियाल, अनिरुद्ध रैथवान, निधि सेमवाल, अनिल गोदियाल, डॉ. जे.के. पांडे और देव रतूड़ी सहित अन्य गणमान्य लोग उपस्थित रहे।
आदित्य अमिताभ त्रिवेदी, युगवार्ता
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