बारामती की मिट्टी में विलीन हुए 'दादा', अमित शाह और भाजपा अध्यक्ष की मौजूदगी ने दिए नए सियासी संकेत

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Lucknow, 29 Jan, 2026 09:13 PM
बारामती की मिट्टी में विलीन हुए 'दादा', अमित शाह और भाजपा अध्यक्ष की मौजूदगी ने दिए नए सियासी संकेत

​"पहुंची वहीं पे खाक, जहां का खमीर था..."

​— विजय दीक्षित

(सीनियर एडिटर, अमृत बाजार पत्रिका/युगांतर समूह)

​बारामती (पुणे) | 29 जनवरी 2026

​अलविदा, अजित दादा!

बारामती की जिस मिट्टी ने अजित पवार को 'दादा' बनाया, आज उसी मिट्टी में उनका नश्वर शरीर पंचतत्व में विलीन हो गया। मूला-मुठा नदी के तट पर बने अंतिम संस्कार स्थल पर उमड़ा लाखों का जनसैलाब केवल भीड़ नहीं थी, बल्कि उस जमीनी पकड़ का सबूत था, जिसे अजित पवार ने चार दशकों में सींचा था।


​यूँ तो अजित पवार का जन्म अहमदनगर के देवलाली प्रवरा में हुआ था, लेकिन उनकी रगों में दौड़ने वाला खून और उनका 'खमीर' बारामती का ही था। आज जब उनकी देह यहाँ की मिट्टी में मिली, तो यह कहावत चरितार्थ हो गई—"पहुंची वहीं पे खाक, जहां का खमीर था।"

​अंक '6' का अद्भुत संयोग और नियति का खेल

नियति ने अजित पवार के जीवन चक्र को 'अंक 6' के एक 

रहस्यमयी संयोग में पिरोया था, जो आज चर्चा का विषय बना रहा: वे इस संसार में ठीक 66 साल, 6 महीने और 6 दिन रहे।

​उनकी मृत्यु का समय (प्रातः 08:43) का कुल योग (8+4+3=15, 1+5=6) भी 6 आता है।

​और यह भी महज संयोग नहीं कि वे महाराष्ट्र के 6वीं बार उपमुख्यमंत्री बने थे।

ऐसा लगता है जैसे कालचक्र ने पहले से ही उनकी जीवन लीला की गणित तय कर रखी थी।

​अमित शाह, भाजपा अध्यक्ष और दिग्गजों का जमावड़ा

अंतिम विदाई में सियासी लकीरें साफ खिंची दिखाई दीं। प्रधानमंत्री मोदी के निर्देश पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष विशेष रूप से एक साथ बारामती पहुँचे। सरकार और संगठन के दोनों शीर्ष चेहरों का एक साथ आना, पवार परिवार के प्रति मोदी जी की गंभीरता को दर्शाता है।


​उनके साथ गोवा के मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत, केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी, और केंद्रीय मंत्री रामदास अठावले भी मौजूद थे। इसके अलावा आंध्र प्रदेश सरकार में मंत्री और टीडीपी नेता नारा लोकेश (नंदामुरी बालकृष्ण के दामाद) और पूर्व सीएम विलासराव देशमुख के पुत्र व अभिनेता रितेश देशमुख ने भी नम आंखों से श्रद्धांजलि दी।

​विपक्ष नदारद: 'साजिश' की राजनीति बेनकाब

हादसे के बाद मल्लिकार्जुन खड़गे, ममता बनर्जी, अखिलेश यादव और उमर अब्दुल्ला जैसे नेताओं ने इसे 'साजिश' बताकर खूब सियासी रोटियाँ सेंकीं, लेकिन अंतिम संस्कार के वक्त इन दलों का कोई भी बड़ा प्रतिनिधि या प्रदेश अध्यक्ष तक नजर नहीं आया। यह बात वहां मौजूद जनसमूह ने भी शिद्दत से महसूस की।


​केवल उद्धव ठाकरे के पुत्र आदित्य ठाकरे ने मातोश्री के संस्कारों का मान रखते हुए घर जाकर पार्थिव शरीर पर पुष्पांजलि दी। कांग्रेस का यह रवैया संकेत देता है कि शायद राहुल गांधी ने भी भांप लिया है कि शरद पवार और नरेंद्र मोदी के बीच अब एक नया और गहरा राजनीतिक समीकरण बनने जा रहा है, जिसमें कांग्रेस के लिए कोई जगह नहीं है।

पिघल गई सियासत: अमित शाह की नम आंखें

श्मशान घाट पर एक ऐसा पल आया जब राजनीति के चाणक्य कहे जाने वाले अमित शाह भी भावुक हो गए। अजित दादा की पत्नी सुनेत्रा पवार, जो अब तक संयत थीं, पति के शव के पैरों पर सिर रखकर फूट-फूटकर रो पड़ीं। उस विकट क्षण में ननद सुप्रिया सुले ने आगे बढ़कर भाभी को संभाला और ढांढस बंधाया। पारिवारिक एकता और दुख का यह दृश्य देखकर अमित शाह अपनी भावनाओं पर काबू नहीं रख सके और उनकी आंखें छलक आईं।


​विरासत का सवाल और शरद पवार की चुनौती

अजित पवार के दोनों पुत्रों—पार्थ और जय पवार—ने वैदिक मंत्रोच्चार के बीच पिता को मुखाग्नि दी। चिता की लपटों के साथ ही अब सबकी निगाहें मराठा क्षत्रप शरद पवार पर टिक गई हैं। अजित दादा के जाने के बाद पार्टी और परिवार को एकजुट रखने का सारा दारोमदार अब 85 वर्षीय 'साहेब' के कंधों पर है।

निष्कर्ष:

बारामती से उठी यह राख शांत जरूर हो जाएगी, लेकिन अजित पवार की अनुपस्थिति से पैदा हुआ राजनीतिक शून्य, महाराष्ट्र की राजनीति को हमेशा के लिए बदल देगा। मोदी जी का इस परिवार के साथ खड़े होना यह संकेत है कि भविष्य की राजनीति अब 'संघर्ष' की नहीं, 'समन्वय' की होगी।

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