Nag Panchami 2026: आज नाग पंचमी पर बन रहा है दुर्लभ संयोग
YUGVARTA NEWS
Lucknow, 17 Aug, 2026 12:25 PMधर्म में सावन मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को नाग पंचमी के रूप में मनाया जाता है। इस दिन नाग देवता की पूजा की जाती है, जिससे परिवार की रक्षा, सर्प भय से मुक्ति, और घर में सुख-समृद्धि का वास होता है। भगवान शिव को भी नाग प्रिय हैं, इसलिए इस दिन शिव कृपा भी मिलती है।
नाग पंचमी इस साल 17 अगस्त को मनाई जा रही है। इस दिन नाग देवता और भगवान शिव की पूजा का विशेष महत्व है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, आस्तिक मुनि ने राजा जनमेजय का सर्प यज्ञ रुकवाकर तक्षक नाग समेत कई सांपों की जान बचाई थी। तभी से नाग पंचमी मनाने की परंपरा है।
नाग पंचमी हर साल सावन महीने के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाई जाती है। इस साल नाग पंचमी 17 अगस्त, सोमवार को मनाई जा रही है। इस दिन भक्त नाग देवता को दूध, लाई, फल और फूल अर्पित करते हैं। मान्यता है कि नाग पंचमी के दिन नाग देवता की पूजा करने से कालसर्प दोष से मुक्ति मिल सकती है। खास बात यह है कि इस साल नाग पंचमी के दिन ही सावन का सोमवार भी पड़ रहा है।
ज्योतिष के नजरिए से नाग पंचमी और सावन सोमवार का एक साथ पड़ना बेहद खास और शुभ माना जा रहा है। ऐसे में भक्तों को नाग पंचमी के दिन नाग देवता के साथ भगवान शिव की भी पूजा करनी चाहिए। मान्यता है कि ऐसा करने से घर में सुख-समृद्धि आती है और तरक्की के रास्ते खुलते हैं। आइए जानते हैं कि नाग पंचमी क्यों मनाई जाती है और इसके पीछे की पौराणिक कहानी क्या है।
नाग पंचमी की प्राचीन कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, अभिमन्यु के पुत्र और कुरु वंश के राजा परीक्षित को ऋषि शमिक के श्राप के कारण तक्षक नाग ने डस लिया था। अपने पिता की मौत की खबर सुनकर उनके पुत्र राजा जनमेजय बहुत क्रोधित हुए। उन्होंने दुनिया के सभी सांपों को खत्म करने के लिए एक बड़े 'सर्प सत्र महायज्ञ' का आयोजन करने का फैसला किया।
राजा जनमेजय के सर्प सत्र यज्ञ के दौरान ऋषियों द्वारा मंत्रों का जाप किया गया। इन मंत्रों के प्रभाव से दुनिया के सभी सांप यज्ञ स्थल पर खिंचे चले आए और यज्ञ की आग में जलने लगे। अपनी जान बचाने के लिए तक्षक नाग ने देवराज इंद्र की शरण ली और उनके सिंहासन से लिपट गया।
इसके बाद जब ऋषियों ने मंत्रों का जाप कर तक्षक नाग को भगवान इंद्र सहित यज्ञ की अग्नि में बुलाना शुरू किया, तो स्वर्ग लोक में भी हलचल मच गई।
उस समय देवताओं के कहने पर आस्तिक मुनि राजा जनमेजय के यज्ञ स्थल पर पहुंचे। आस्तिक मुनि देवी मनसा के पुत्र और बहुत ज्ञानी ऋषि थे। उन्होंने अपनी बुद्धि और बातों से राजा जनमेजय को प्रसन्न कर दिया। इससे खुश होकर राजा ने आस्तिक मुनि से कोई भी वरदान मांगने को कहा।
तब आस्तिक मुनि ने राजा जनमेजय से सर्प सत्र यज्ञ तुरंत रोकने और सांपों की रक्षा करने का वरदान मांगा। आस्तिक मुनि के कहने पर राजा जनमेजय ने यज्ञ रोक दिया। इस तरह तक्षक नाग समेत बाकी सांपों की जान बच गई।
मान्यता है कि जिस दिन आस्तिक मुनि ने सर्प सत्र यज्ञ रुकवाकर सांपों की जान बचाई और उन्हें राहत देने के लिए उन पर कच्चा दूध और पानी डाला, वह सावन महीने के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि थी। इसके बाद सांपों ने आस्तिक मुनि को आशीर्वाद दिया और कहा कि जो भी व्यक्ति इस तिथि पर नाग देवता की पूजा करेगा, उसे सांपों के डर से सुरक्षा मिलेगी। तभी से सावन शुक्ल पंचमी के दिन नाग पंचमी मनाने की परंपरा चली आ रही है।
धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व
कालसर्प दोष से मुक्ति:
इस दिन पूजा करने से कुंडली के दोष कम होते हैं।
भगवान शिव की पूजा: शिव जी के गले में नाग आभूषण की तरह रहते हैं, अतः शिव भक्तों के लिए यह दिन खास है।
कुण्डलिनी जागरण: योग और अध्यात्म में नाग को शक्ति या कुण्डलिनी जागरण का प्रतीक माना गया है।
सामाजिक और पर्यावरणीय महत्व
प्रकृति से प्रेम: यह पर्व हमें जीव-जंतुओं और प्रकृति का सम्मान करना सिखाता है।
कृषि की रक्षा: सांप खेतों के चूहे और कीटों को खाकर फसल बचाते हैं, जिससे किसानों को लाभ होता है।



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