नवरात्रि में क्यों होती है 9 देवियों की पूजा? जानें उत्पत्ति, महिमा और वरदान
मां शैलपुत्री से माँ सिद्धिदात्री तक, जानिए नवदुर्गा के नौ स्वरूपों की पौराणिक कथा, उनके नाम का रहस्य और पूजा से जुड़ी धार्मिक मान्यताएं
YUGVARTA NEWS
Lucknow, 9 Oct, 2026 08:33 AMशारदीय नवरात्रि सनातन धर्म के प्रमुख पर्वों में से एक है। आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से महानवमी तक मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की विधि-विधान से पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, नवदुर्गा की आराधना से भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं और ग्रहों से जुड़े प्रतिकूल प्रभावों से मुक्ति मिलने की कामना की जाती है। देवी भागवत पुराण सहित विभिन्न धार्मिक ग्रंथों में देवी के स्वरूपों और उनकी महिमा का वर्णन मिलता है। मान्यता है कि जब-जब तीनों लोकों में असुरों का अत्याचार बढ़ा, तब देवी ने विभिन्न रूप धारण कर उनका संहार किया और धर्म की रक्षा की। आइए जानते हैं नवदुर्गा के नौ स्वरूपों की उत्पत्ति, उनके नामकरण और उनसे जुड़ी धार्मिक मान्यताओं के बारे में।
1. मां शैलपुत्री: सुख-समृद्धि की अधिष्ठात्री
नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है। इन्हें नवदुर्गा का प्रथम स्वरूप माना जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार, प्रजापति दक्ष द्वारा भगवान शिव का अपमान किए जाने के बाद देवी सती ने यज्ञ की अग्नि में अपने प्राण त्याग दिए थे। इसके बाद उन्होंने पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री के रूप में जन्म लिया। हिमालय की पुत्री होने के कारण उनका नाम शैलपुत्री पड़ा। इन्हें माता पार्वती के रूप में भी जाना जाता है।
मां शैलपुत्री का वाहन वृषभ यानी बैल है। उनके दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल सुशोभित रहता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, उनकी आराधना से सुख-समृद्धि में वृद्धि होती है और कुंडली में चंद्रमा से संबंधित दोषों की शांति की कामना की जाती है।
2. मां ब्रह्मचारिणी: तपस्या और दृढ़ संकल्प की प्रतीक
नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा-अर्चना की जाती है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, देवर्षि नारद के उपदेश से प्रेरित होकर माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी। उन्होंने हजारों वर्षों तक साधना की। तपस्विनी स्वरूप में देवी श्वेत वस्त्र धारण करती हैं। उनके दाहिने हाथ में जपमाला और बाएं हाथ में कमंडल रहता है।
कठोर तप और ब्रह्मचर्य का पालन करने के कारण उनका नाम ब्रह्मचारिणी पड़ा। मान्यता है कि उनकी पूजा से साधक को संयम, वैराग्य, धैर्य और दृढ़ निश्चय की प्रेरणा मिलती है। ज्योतिषीय मान्यताओं में उनकी आराधना को मंगल दोष की शांति से भी जोड़ा जाता है।
3. मां चंद्रघंटा: साहस और पराक्रम का स्वरूप
मां दुर्गा का तीसरा स्वरूप मां चंद्रघंटा हैं। धार्मिक कथाओं के अनुसार, ब्रह्मा, विष्णु और महेश के तेज से देवी के इस स्वरूप की उत्पत्ति हुई। उन्होंने महिषासुर के विरुद्ध युद्ध कर उसका वध किया। मां चंद्रघंटा को देवी का वीर और युद्धप्रिय स्वरूप माना जाता है।
उनके मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र सुशोभित रहता है, इसी कारण उन्हें चंद्रघंटा कहा जाता है। दस भुजाओं वाली देवी सिंह पर सवार रहती हैं और विभिन्न अस्त्र-शस्त्र धारण करती हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, उनकी आराधना से साहस, शक्ति और आत्मविश्वास में वृद्धि होती है। शुक्र ग्रह से संबंधित दोषों की शांति के लिए भी उनकी पूजा की जाती है।
4. मां कूष्मांडा: सृष्टि की रचनाकार
नवरात्रि के चौथे दिन मां कूष्मांडा की उपासना की जाती है। इन्हें नवदुर्गा का चौथा स्वरूप माना जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, देवी ने अपनी मंद मुस्कान से ब्रह्मांड की रचना की थी। इसी कारण उन्हें सृष्टि की आदिशक्ति के रूप में भी स्मरण किया जाता है।
आठ भुजाओं वाली मां कूष्मांडा सिंह पर विराजमान रहती हैं। उनके स्वरूप को अष्ट सिद्धियों और समृद्धि से जोड़ा जाता है। कूष्मांड यानी कद्दू का संबंध भी देवी की पूजा परंपरा से बताया जाता है, जिसके कारण उनका नाम कूष्मांडा प्रचलित हुआ। मान्यता है कि उनकी आराधना से पद-प्रतिष्ठा, दीर्घायु और अच्छे स्वास्थ्य की कामना पूरी होती है। सूर्य ग्रह से संबंधित दोषों की शांति के लिए भी उनकी पूजा का महत्व बताया गया है।
5. मां स्कंदमाता: संतान सुख और ममता का प्रतीक
नवरात्रि के पांचवें दिन मां स्कंदमाता की पूजा की जाती है। भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र स्कंद, जिन्हें कार्तिकेय भी कहा जाता है, की माता होने के कारण देवी का नाम स्कंदमाता पड़ा। धार्मिक कथाओं में भगवान कार्तिकेय को तारकासुर के वध से जोड़ा गया है।
मां स्कंदमाता चार भुजाओं वाली देवी हैं। वे अपनी गोद में बाल स्कंद को धारण किए कमल पर विराजमान रहती हैं। उनका स्वरूप मातृत्व, करुणा और वात्सल्य का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, संतान सुख और पारिवारिक कल्याण की कामना से उनकी आराधना की जाती है। ज्योतिषीय परंपराओं में उनकी पूजा को बुध ग्रह से संबंधित दोषों की शांति से भी जोड़ा जाता है।
6. मां कात्यायनी: शक्ति और धर्म की रक्षक
नवरात्रि के छठे दिन मां कात्यायनी की पूजा होती है। पौराणिक कथा के अनुसार, महर्षि कात्यायन ने पराशक्ति की आराधना कर देवी को पुत्री रूप में प्राप्त करने की कामना की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर देवी ने उनके घर जन्म लिया। महर्षि कात्यायन की पुत्री होने के कारण उनका नाम कात्यायनी पड़ा।
मां कात्यायनी का वर्ण स्वर्ण के समान तेजस्वी बताया गया है। वे चार भुजाओं में विभिन्न अस्त्र-शस्त्र धारण करती हैं और सिंह पर सवार रहती हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, देवी ने महिषासुर का वध कर धर्म की रक्षा की थी। उनकी उपासना को शक्ति, आत्मबल और साहस की प्राप्ति से जोड़ा जाता है। गुरु ग्रह से संबंधित दोषों की शांति के लिए भी उनकी पूजा का उल्लेख मिलता है।
7. मां कालरात्रि: भय और नकारात्मकता का नाश करने वाली
नवरात्रि के सातवें दिन मां कालरात्रि की पूजा-अर्चना की जाती है। नवदुर्गा के इस स्वरूप को अत्यंत शक्तिशाली और उग्र माना जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, शुंभ-निशुंभ और रक्तबीज जैसे असुरों के संहार के लिए देवी ने भयानक रूप धारण किया था।
मां कालरात्रि का वर्ण श्याम है, उनके केश खुले रहते हैं और गले में सफेद चमकदार माला सुशोभित होती है। उनका वाहन गर्दभ यानी गधा है। काल का अंत करने और अंधकार का नाश करने वाली देवी के रूप में उनका नाम कालरात्रि पड़ा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, उनकी पूजा से भय दूर करने, साहस बढ़ाने और शत्रुओं पर विजय की कामना की जाती है। शनि ग्रह से संबंधित दोषों की शांति के लिए भी उनकी आराधना का महत्व बताया गया है।
8. मां महागौरी: शांति, पवित्रता और सौभाग्य की देवी
नवरात्रि के आठवें दिन मां महागौरी की पूजा की जाती है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, लंबे समय तक कठोर तपस्या करने के कारण माता पार्वती का शरीर अत्यंत श्याम वर्ण का हो गया था। बाद में भगवान शिव की कृपा से उन्हें गौर वर्ण प्राप्त हुआ। उनके इसी अत्यंत उज्ज्वल स्वरूप के कारण वे महागौरी कहलाने लगीं।
मां महागौरी की चार भुजाएं हैं और उनका वाहन वृषभ यानी बैल है। देवी का यह स्वरूप शांति, पवित्रता और सौम्यता का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, उनकी आराधना से सुख-समृद्धि, अच्छे स्वास्थ्य और पारिवारिक मंगल की कामना की जाती है। ज्योतिषीय परंपराओं में उनकी पूजा को राहु ग्रह से संबंधित दोषों की शांति से भी जोड़ा जाता है।
9. मां सिद्धिदात्री: सिद्धियों और आध्यात्मिक पूर्णता की देवी
नवरात्रि के अंतिम दिन यानी महानवमी पर मां सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। नवदुर्गा का यह नौवां स्वरूप सिद्धियों और आध्यात्मिक उन्नति का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, मां सिद्धिदात्री की कृपा से भगवान शिव को अणिमा, महिमा और गरिमा सहित विभिन्न सिद्धियां प्राप्त हुई थीं। देवी की कृपा से भगवान शिव के अर्धनारीश्वर स्वरूप की उत्पत्ति का भी उल्लेख मिलता है।
सभी प्रकार की सिद्धियां प्रदान करने वाली मानी जाने के कारण उनका नाम सिद्धिदात्री पड़ा। देवी कमल या सिंह पर विराजमान दिखाई देती हैं और उनकी चार भुजाओं में चक्र, गदा, शंख तथा कमल सुशोभित रहते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, उनकी पूजा से आध्यात्मिक उन्नति और सिद्धियों की प्राप्ति की कामना की जाती है। ज्योतिषीय परंपराओं में उनकी आराधना को केतु ग्रह से संबंधित दोषों की शांति से भी जोड़ा जाता है।
नवदुर्गा की आराधना का क्या है संदेश?
नवरात्रि के नौ दिन मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की उपासना के साथ शक्ति, संयम, साहस, करुणा, तपस्या और आध्यात्मिक उन्नति के प्रतीकों को समझने का अवसर भी देते हैं। प्रत्येक देवी का स्वरूप जीवन के अलग-अलग गुणों और आदर्शों का संदेश देता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सच्ची श्रद्धा और विधि-विधान से की गई आराधना से भक्त मानसिक शांति, सकारात्मकता और सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।
इस प्रकार, नवदुर्गा की पूजा केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि बुराई पर अच्छाई की विजय और धर्म की रक्षा के संदेश से भी जुड़ी है। नवरात्रि के दौरान मां दुर्गा के नौ स्वरूपों का स्मरण कर भक्त अपने जीवन में सद्गुणों, आत्मविश्वास और सद्भाव को अपनाने का संकल्प लेते हैं।
नोट: ग्रह दोषों से मुक्ति और विशेष वरदानों से संबंधित विवरण धार्मिक एवं ज्योतिषीय मान्यताओं पर आधारित हैं।



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