​'एपस्टीन फाइल्स': पश्चिमी सभ्यता के पतन का दस्तावेज या भारतीय 'लुटियंस' के लिए खतरे की घंटी?

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Lucknow, 2 Feb, 2026 09:00 PM
​'एपस्टीन फाइल्स': पश्चिमी सभ्यता के पतन का दस्तावेज या भारतीय 'लुटियंस' के लिए खतरे की घंटी?

— विजय दीक्षित
(वरिष्ठ संपादक, अमृत बाजार पत्रिका एवं युगांतर समूह)

​अमेरिका की एक अदालत ने जब जेफ्री एपस्टीन मामले से जुड़ी हजारों पन्नों की फाइलों से 'काली स्याही' हटाई, तो बेपर्दा केवल अमेरिकी राष्ट्रपति या ब्रिटिश राजकुमार नहीं हुए, बल्कि वह पूरी 'वैश्विक व्यवस्था' नग्न हो गई, जो लोकतंत्र का चोला ओढ़कर पर्दे के पीछे घिनौना खेल खेलती है। एक भारतीय पत्रकार के तौर पर, जब मैं इन दस्तावेजों का विश्लेषण करता हूं, तो मुझे यह महज अमेरिका का आंतरिक मामला नहीं, बल्कि भारत की 'सफेदपोश' व्यवस्था के लिए एक गंभीर चेतावनी दिखाई देती है।
​लुटियंस दिल्ली और वाशिंगटन का 'अदृश्य' सेतु
वरिष्ठ पत्रकार हरि शंकर व्यास ने अपने मूल आलेख में एक बेहद सटीक टिप्पणी की है— "दुनिया वैसे ही चलती है जैसे भारत में लुटियंस दिल्ली के नेटवर्क रहे हैं।" यह पंक्ति ही इस पूरे प्रकरण को भारतीय संदर्भ में समझने की कुंजी है। जेफ्री एपस्टीन सिर्फ एक व्यक्ति नहीं, बल्कि उस 'दलाल संस्कृति' (Brokerage Culture) का प्रतीक था, जो सत्ता, सेक्स और ब्लैकमेल के दम पर सरकारों को नचाती है।
​आज भारत जब एक वैश्विक महाशक्ति बनने की ओर अग्रसर है, हमें यह आत्ममंथन करना होगा कि नई दिल्ली के 'पावर कॉरिडोर' में सक्रिय लॉबिस्ट और कॉर्पोरेट दलाल क्या इसी पश्चिमी मॉडल का अंधानुकरण नहीं कर रहे? हमारे यहाँ भी 'हनी ट्रैप' के मामले दबी जुबान में सुने जाते रहे हैं। एपस्टीन का मामला हमें आगाह करता है कि जब रसूखदार लोग कानून से ऊपर खुद को मानने लगते हैं, तो वह राष्ट्र की सुरक्षा और समाज की नैतिकता, दोनों के लिए खतरा बन जाते हैं।
​हनी ट्रैप: भारत की सुरक्षा पर मंडराता खतरा
इस मामले का सबसे चिंताजनक पहलू 'राष्ट्रीय सुरक्षा' है। दस्तावेजों से संकेत मिलता है कि एपस्टीन का नेटवर्क संभवतः मोसाद या अन्य खुफिया एजेंसियों के लिए 'ब्लैकमेल' का काम करता था। यह भारत के लिए एक 'वेक-अप कॉल' है।
भारतीय राजनेता, नौकरशाह और बड़े उद्योगपति अक्सर पश्चिम की यात्राओं पर जाते हैं। यदि वैश्विक स्तर पर ऐसे 'हनी ट्रैप' नेटवर्क सक्रिय हैं, तो क्या हमारे नीति-निर्माता सुरक्षित हैं? कल्पना कीजिए, यदि भारत का कोई शीर्ष व्यक्ति किसी 'एपस्टीन' के जाल में फंस जाए, तो वह ब्लैकमेल के दबाव में देश के सामरिक हितों से समझौता कर सकता है। यह केवल चरित्र का प्रश्न नहीं, बल्कि राष्ट्र की संप्रभुता का प्रश्न है।
​न्याय व्यवस्था का दोहरे चरित्र
एपस्टीन मामले ने यह भी दिखाया कि 'अमीर का कानून' और 'गरीब का कानून' अलग होता है। वर्षों तक अमेरिकी न्याय विभाग ने फाइलों को दबाए रखा। भारत में भी हम अक्सर देखते हैं कि हाई-प्रोफाइल मामलों में जांच की गति धीमी हो जाती है या गवाह मुकर जाते हैं। भारत, जो 'विश्वगुरु' बनने का स्वप्न देख रहा है, उसे अपनी न्याय प्रणाली को इतना पारदर्शी बनाना होगा कि जिससे कोई भी पूंजीपति 'रसूखदार' अपनी तिजोरी के दम पर न्याय का गला न घोंट सके।
​पूंजीवाद बनाम भारतीय मूल्य
अंत में, यह मामला हमें अपनी संस्कृति की ओर लौटने का संदेश देता है। पश्चिम का अनियंत्रित पूंजीवाद जहां भोग और वासना को ही जीवन का चरम मानता है, वहीं भारतीय दर्शन 'धर्म' और 'संयम' की बात करता है। आज भारत के कुलीन वर्ग में भी पश्चिम की नकल करने की होड़ लगी है। एपस्टीन की फाइलें बताती हैं कि उस चमक-दमक के पीछे कितना गहरा अंधेरा है।
​अंत में कहा जा सकता है कि जेफ्री एपस्टीन की कहानी सात समुद्र पार की एक घटना हो सकती है, लेकिन इसकी गूंज भारत के सत्ता के गलियारों में सुनी जानी चाहिए। यह समय है कि हम अपनी व्यवस्थाओं को ऐसे 'वैश्विक मकड़जाल' से सुरक्षित करें और सुनिश्चित करें कि भारत का लोकतंत्र 'कॉर्पोरेट दलालों' और 'ब्लैकमेलरों' का बंधक न बने। गंदगी चाहे वाशिंगटन में हो या दिल्ली में, सफाई जरूरी है।

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