गौरैया से मेरा प्रेम - बृजलाल
पर्यावरण गौरैया खेती और गांव, आधुनिक पीढ़ी के लिए परंपराएं जानना जरूरी
YUGVARTA NEWS
Lucknow, 28 Aug, 2026 07:56 PM28 अगस्त, लखनऊ : आज 28 अगस्त है, लखनऊ में इंद्रदेव की विशेष कृपा है, आज भी वर्षा हुई है। मौसम थोड़ा खुल गया है लेकिन हल्की बूँदे अब भी पड़ रही हैं। बरसात के कारण गौरैया दाना चुगने निकल नहीं पाई। मौसम खुलते ही निकल पड़ी दाना चुगने।
— Aditya Amitabh Trivedi (@ShubhadityaT) August 28, 2026
मैं 2011 में लखनऊ के गोमतीनगर विस्तार में यह मकान बनवा रहा था, उसी समय गौरैया का एक जोड़ा आया, मुझे ऐसा लगा कि पक्षियों का यह जोड़ा कह रहा हो, आप तो अपने लिए पक्का मकान बनवा रहे है, हम गौरैयों के लिए भी इंतज़ाम कर दें। पहले तो हम फूस और खपरैल के मकान में घोसला बना लेते थे और आप के साथ ही रहते थे,किंतु गांवों में भी लोगों ने “कंक्रीट” के जंगल बना लिए, आख़िर हम गौरैया कहाँ जाय? मैंने तुरंत अपने सुरक्षा कर्मी मोहम्मद असलम को बाज़ार भेज कर कई मिट्टी के “गुल्लक”मंगाए और कुछ देर पानी में भिगोने के लिए छोड़ दिया, फिर गुल्लक में सूराख बनाये जिससे गौरैया आसानी से गुल्लक में आ जा सके।सुराख़ अधिक बड़ा नहीं होना चाहिए नहीं तो गौरैया को डर लगता है कि कहीं मांसाहारी पक्षी कौवा, सिकरा, महोखा उसके अंडे-बच्चे न खा जाय। यहाँ से शुरुवात हुई मेरे लखनऊ आवास में गौरैया और अन्य पक्षियों का संरक्षण। उसी समय से हमारे आवास में बारहों महीने चिड़ियों के लिए बाजरा, क़ानून, थोड़ा खुदी(टूटे चावल) दानें के रूप में लगातार रखा जा रहा है। घर के सामने लखनऊ विकास प्राधिकरण से अनुमति लेकर ग्रीन-बेल्ट में लगभग 15000 वर्गफुट में विभिन्न प्रकार के वृक्ष लगा दिए जो अब काफ़ी बड़े हो गए है। अब तो गौरैया के अलावा, मुनिया, बुलबुल, फ़ाख्ता, सेवेन-सिस्टर(जंगल बैबलर), कोयल, कौवा,महोखा, क़िलहट, मैना, सन-बर्ड, भुजंगा अन्य चिड़िया भी आकार बस गई और यहाँ अपनी बंश-बृद्धि कर रही है।बरसात में कभी-कभी “पपीहा” भी आ जाता है और अपनी बिरह के गीत-“पी कहाँ, पी कहाँ” सुनाती है। एक बार “चातक” भी अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुका है जो बरसात में हिमालय की तलहटी से प्रवास के लिए आ आते हैं।धनेश का जोड़ा तो अक्सर बाग़ीचे में जमैकन चेरी और अंजीर खाने आ जाता है। गौरैया तो पेड़ पर नहीं, वह तो आप के साथ घर में रहती है, इसीलिए इसे “House Sparrow” कहा जाता है।
मेरा तो बचपन ही इन गौरैयों के बीच बीता है। कभी टोकरी के नीचे आँगन में दाना रखकर इन्हें पकड़ लेते थे और गुलाबी रंग से रंग देते थे। गुलाबी गौरैया जब आँगन और घर के मुडेर पर फुदकती थी तो अपने बाल- मित्रों से बड़े शान से कहते थे कि यह मेरी गौरैया है। घर में माता-पिता इन पक्षियों का बहुत ख्याल रखते थे।
बरसात में गौरैया के लिए थोड़ा मुश्किल भरा होता है। गर्मियों में अनाज, घास के बीज इन्हें आसानी से चुगने के लिए मिल जाते हैं किंतु बरसात में नहीं मिल पाते, हाँ कीड़े- मकोड़े अवश्य मिल जाते है जिनको गौरैया चुगकर प्रोटीन का जुगाड़ कर लेती है।
जब हम गाँव में थे तो बरसात के समय माँ कहती थी कि गौरैया “उपवास” न करने पाये, बेचारी बरसात के कारण बाहर नहीं निकल पा रही है। हम लोग घर में पका हुवा चावल गौरैया के लिए “ओसारा”(बरामदा) में रख देते थे।
धान की कटाई के समय बालियों की सिधरी(कलात्मक गुच्छे) बनाये जाते थे जिसे बरामदे में लटकाया जाता था, यही तो हम लोगों के घर को सजाने का एक साधन भी था।इसे बरसात में घर के ओसारे में अवश्य लटकाया जाता था जिससे गौरैया दाना चुग सके और बरसात के कारण वह भूखी न रह जाय। यही तो हमारे संस्कार और परंपरायें थी जो माता-पिता और बुजुर्गों से मिली।
धान की कटाई के समय मेरा भाई गोविंद लाल , सिधरी बनाकर लाता है जो हमारे ड्राइंग-रूम के साथ बरामदे की शोभा बढ़ा रही है और घर की सदस्य गौरैया को भी भोजन मिल रहा है।
वन्दे मातरम् !
Brij Lal IPS Retd
Ex-DGP UP
Member of Parliament(Rajya Sabha)



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