लखनऊ बंगाली क्लब: माँ को विदा देने की अनूठी परम्परा, पर्यावरण संरक्षण का अद्भुत संदेश
YUGVARTA NEWS
Lucknow, 22 Oct, 2026 11:14 PMयुगवार्ता लखनऊ; भारतीय संस्कृति में पर्व और त्योहार उत्सव की तरह होते हैं. और दुर्गापूजा की बात तो एकदम निराली है. दुर्गापूजा के मौके पर लोगों का उत्साह तो सिर चढ़कर बोलता है.
यूपी की राजधानी लखनऊ में भी दुर्गापूजा का उत्साह जबर्दस्त दिखता है. यहां के बंगाली क्लब में 1914 से अब तक लगातार दुर्गापूजा का आयोजन किया जा रहा है. लखनऊ की सरजमीं पर इसी बंगाली क्लब से दुर्गापूजा शुरू हुई थी. इस बंगाली क्लब की दुर्गापूजा की सबसे रोचक बात यह है कि यहां बनने वाली मूर्ति की लकड़ी का बेस 100 साल से भी ज्यादा पुराना है.
माँ को विदा देने की अनूठी परम्परा लखनऊ बंगाली क्लब की दुर्गा पूजा में मां को विदा करने की अनूठी परंपरा है। दशमी के दिन सिंदूर खेला के बाद मां को पारंपरिक तरीके से विदाई दी जाती है और उनसे अगले साल फिर अपने घर आने की प्रार्थना की जाती है। यह सबसे भावुक क्षण होते हैं जब दुर्गा मां की उनके पूरे परिवार के साथ विदाई करते हैं। विदाई से मतलब मां के रूप का यानी मूर्ति का जल विसर्जन है बंगाली क्लब इस बात का पूरा ध्यान रखता है पर्यावरण को नुकसान ना हो और मां का विसर्जन भी हो जाए।
इसके लिए बंगाली क्लब ने क्लब परिसर में ही एक छोटा सा ताल बना रखा है मां के विसर्जन से पहले क्लब के परिसर में मां की विदाई शोभायात्रा निकाली जाती है ढा- क की ताल पर हर्षोल्लास के संग नृत्य करते हुए मां की यह अंतिम विदाई इसलिए अनूठी है क्योंकि इसमें मां को नदी पर या किसी दूर दराज तालाब पर नहीं लेकर जाते हैं बल्कि परिसर में ही तालाब में मां का विसर्जन किया जाता है।
इस से इस विसर्जन से परंपरा तो पूरी होती है साथ ही पर्यावरण का बचाव होता है मां की प्रतिमा की मिट्टी तालाब में ही समाहित हो जाती है और उनके लिए इस्तेमाल किए गए बॉस वस्त्र और शस्त्र मुकुट सब सामग्री जल में ऊपर तैर जाती है जिसे बाद में एकत्रित करके संभाल लिया जाता है और अगले वर्ष दुर्गा पूजा आने पर इसी तालाब की मिट्टी से फिर कारीगर मां की प्रतिमा को तैयार करते हैं।
इससे ना तो नदी पर जाने का झंझट न ही ट्रैफिक में फसना है और ना ही नदियों को गंदा करना है यह संदेश जाता है। यानी पूजा प्रार्थना और परंपरा के साथ पर्यावरण का ध्यान रखते हुए मां की प्रतिमा का पुनर्निर्माण हो जाता है। इस विदाई में वृद्ध से लेकर महिलाएं ,कन्या और पुरुष सभी मां दुर्गा के रथ को छूने और हाथ देने का प्रयास करते हैं. दरअसल, हर साल मां दुर्गा की प्रतिमा एक ही लकड़ी के बेस पर बनती है और वह बेस सदियों पुराना है.
हर साल मूर्ति विसर्जन के बाद लकड़ी का वह बेस काटकर ले आया जाता है. फिर उसे पूरे बहुत संभाल कर रखा जाता है. अगले साल फिर उसी बेस पर मां देवी विराजमान होती हैं.
पुराना मुकुट का विसर्जन और नए मुकुट को धरोहर के तौर पर रखने की परम्परा
बंगाली क्लब ने अपनी स्थापना के बाद से ही मां दुर्गा के प्रति अपनी आगाध श्रद्धा की वजह से उनके नए मुकुट को सालभर के लिए सुरक्षित रखना शुरू किया था. यानी मूर्ति विसर्जन से पहले मां दुर्गा का मुकुट क्लब के लोग अपने साथ ले आते थे और साल भर पहले मां दुर्गा के उतारे गए मुकुट के साथ मूर्ति विसर्जन किया करते थे.
इस परंपरा का निर्वहन आज भी यहां किया जाता है. दरअसल, लकड़ी का बेस सुरक्षित रखना हो या सालभर के लिए मुकुट, इसके पीछे क्लब के लोगों की अपनी आस्था है. वे कहते हैं जिस स्ट्रक्चर पर मां के चरण पड़े हैं, वह मां के आशीर्वाद के तौर पर बंगाली क्लब में रहे और लोगों को आदिशक्ति मां दुर्गा का आशीर्वाद मिलता रहे. यानी इस बेस या मुकुट के होने से मां की मौजूदगी का अहसास हमेशा होता रहता है.
इस बार भी पूजा के बाद दुर्गा मा के विसर्जन में इसी परम्परा का निर्वाह किया गया.
Rupali Mukherjee



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