मरुत-49 का रहस्य: लंका दहन के समय तुलसीदास ने क्यों किया था 'उनचास मरुतों' का आह्वान?
YUGVARTA NEWS
Lucknow, 25 Jan, 2026 09:35 PMपढ़िए "विजय दीक्षित" की विशेष रिपोर्ट
कोलकाता: अक्सर हम रामचरितमानस और विशेषकर सुंदरकांड का पाठ भक्ति भाव से करते हैं, लेकिन गोस्वामी तुलसीदास जी की प्रत्येक चौपाई में जो विज्ञान और इतिहास छिपा है, वह आधुनिक शोधकर्ताओं के लिए भी आश्चर्य का विषय है। सुंदरकांड के 25वें दोहे में लंका दहन के प्रसंग में तुलसीदास जी लिखते हैं—
"हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास।
अट्टहास करि गर्जा कपि बढ़ि लाग अकास।।"
एक सामान्य पाठक के लिए यह केवल एक काव्यात्मक अभिव्यक्ति हो सकती है, लेकिन यदि इसका पौराणिक और वैज्ञानिक विश्लेषण किया जाए, तो यह आधुनिक मौसम विज्ञान और अंतरिक्ष विज्ञान का एक अद्भुत दस्तावेज साबित होता है। तुलसीदास जी ने यहाँ 'तेज आंधी' ना लिखकर 'मरुत उनचास' क्यों लिखा? इसका उत्तर हमारे वेदों और पुराणों में छिपा है।
इंद्र, दिति और 49 मरुतों की उत्पत्ति-
पौराणिक साक्ष्य में इन 49 मरुतों के अस्तित्व में आने की कथा श्रीमद्भागवत पुराण (स्कंध 6, अध्याय 18) और विष्णु पुराण में विस्तार से मिलती है। कथा के अनुसार, महर्षि कश्यप की पत्नी 'दिति' ने इंद्र को मारने वाले पुत्र की कामना से कठिन तप किया। इंद्र ने अपनी सुरक्षा के लिए सूक्ष्म रूप धरकर दिति के गर्भ में प्रवेश किया और अपने वज्र से भ्रूण के सात टुकड़े कर दिए।
जब वे टुकड़े गर्भ में रोने लगे, तो इंद्र ने कहा "मा रुद" (रो मत)। इसी 'मा रुद' शब्द से उनका नाम 'मरुत' पड़ा। दिति के आग्रह पर इंद्र ने उन 7 टुकड़ों के पुनः 7-7 विभाग किए। इस प्रकार सात गुणीत सात= 49 मरुत अस्तित्व में आए। बाद में इंद्र ने उन्हें अपना सहायक बना लिया, जिन्हें 'मरुतगण' कहा जाता है।
आधुनिक विज्ञान बनाम वैदिक विज्ञान-
वायु की सात परत तुलसीदास जी ने जब 49 मरुतों का उल्लेख किया, तो वे वायु के सूक्ष्म ब्रह्मांडीय विभाजन को इंगित कर रहे थे। आधुनिक विज्ञान वायुमंडल को ट्रोपोस्फीयर, स्ट्रेटोस्फीयर आदि में बांटता है, लेकिन ऋषियों ने हजारों साल पहले वायु को 7 मुख्य श्रेणियों (और प्रत्येक के 7 उप-विभागों) में वर्गीकृत किया था, जो पृथ्वी से लेकर सुदूर अंतरिक्ष तक फैली हैं।
आवह (The Atmospheric Wind): यह मेघमंडल और बादलों को नियंत्रित करती है। (बादल और वर्षा इसी क्षेत्र में होते हैं)।
प्रवह (Solar Wind equivalent): यह सूर्य मंडल के पास अति वेगवान वायु है। यह बादलों को उड़ाने और ऊर्जा संचरण का कार्य करती है।
उद्वह (Lunar Atmosphere): यह वायु चंद्रलोक पर प्रतिष्ठित है।
संवह (Stellar Wind): यह नक्षत्र मंडल में स्थित है और नक्षत्रों को गति देने वाली शक्ति है।
विवह (Planetary Wind): यह ग्रह मंडल में स्थित है। ग्रहों की गति और स्थान को नियंत्रित करने वाली वायु यही है।
परिवह (Galactic Wind): यह सप्तर्षि मंडल (Ursa Major) के आकाश में स्थित वायु है।
परावह (Cosmic Wind): यह सबसे ऊपरी, सूक्ष्म और शक्तिशाली वायु है जो ध्रुव और ब्रह्मांडीय चक्र को एक स्थान पर थामे रहती है।
लंका दहन में 'हरि प्रेरित' 49 मरुतों का औचित्य-
जब हनुमान जी ने लंका में अग्नि प्रज्वलित की, तो उसे विध्वंसक रूप देने के लिए केवल पृथ्वी की सतह पर बहने वाली हवा काफी नहीं थी। तुलसीदास जी लिखते हैं कि 'हरि प्रेरित' यानी ईश्वरीय संकेत पर ब्रह्मांड की समस्त 49 प्रकार की वायु (पाताल से लेकर सुदूर अंतरिक्ष तक) एक साथ सक्रिय हो गईं।
इसका वैज्ञानिक अर्थ यह है कि उस समय लंका में एक ऐसा 'वैक्यूम' (Vacuum) और महा-चक्रवात बना, जिसमें पृथ्वी की सतह से लेकर ऊपरी वायुमंडल तक की ऊर्जा समाहित थी। अग्नि को वायु का मित्र कहा जाता है। जब 49 मरुतों ने अग्नि का साथ दिया, तो लंका का बचना असंभव था। यह दर्शाता है कि हनुमान जी का क्रोध और प्रकृति दोनों रावण के विनाश के लिए एकजुट हो गए थे।
वेदों में वर्णित वायु के 7 क्षेत्र :-
वेदों के अनुसार, वायु के 49 गण इन 7 लोकों/स्थानों में विचरण करते हैं:
ब्रह्मलोक
इंद्रलोक
अंतरिक्ष
भूलोक (पूर्व दिशा)
भूलोक (पश्चिम दिशा)
भूलोक (उत्तर दिशा)
भूलोक (दक्षिण दिशा)
(गणित: 7 स्थान \times 7 गण = कुल 49 मरुत
अंत में-
यह शोध सिद्ध करता है कि सनातन धर्म के ग्रंथ केवल कर्मकांड की पुस्तकें नहीं हैं, बल्कि वे उन्नत विज्ञान के कोड हैं। जिस 'स्पेस साइंस' और वायु की परतों को समझने में पश्चिम को सदियां लग गईं, वह ज्ञान भारत में त्रेता युग से उपलब्ध था और तुलसीदास जी ने उसे जनभाषा अवधी में सहजता से पिरो दिया। आवश्यकता है कि हम अपनी इस वैज्ञानिक धरोहर को पहचानें और उस पर गर्व करें।
(आलेख विजय दीक्षित, सीनियर एडिटर ,अमृत बाजार पत्रिका और युगान्तर समूह कोलकाता)


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