अगले एक दशक का रोडमैप (2026-36): 'मोबिलिटी' की परिभाषा में होगा बदलाव; हाइड्रोजन, ईवी और लिथियम की चुनौतियों के बीच एक आत्मनिर्भर भारत की तस्वीर

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Lucknow, 26 Jan, 2026 10:27 PM
अगले एक दशक का रोडमैप (2026-36): 'मोबिलिटी' की परिभाषा में होगा बदलाव; हाइड्रोजन, ईवी और लिथियम की चुनौतियों के बीच एक आत्मनिर्भर भारत की तस्वीर

विजय दीक्षित,वरिष्ठ सम्पादक, अमृत बाजार पत्रिका और युगान्तर समूह, कोलकाता

​भारतीय ऑटोमोबाइल उद्योग इस समय एक ऐसे दोराहे पर खड़ा है, जहां से लिया गया हर मोड़ देश के अगले 50 सालों की आर्थिक और पर्यावरणीय दिशा तय करेगा। अगर हम अगले एक दशक (2026-2036) को सूक्ष्मता से देखें, तो यह केवल पेट्रोल से बिजली पर जाने की कहानी नहीं है, बल्कि यह एक 'प्रदूषण मुक्त और ऊर्जा स्वतंत्र' भारत के निर्माण का दस्तावेज है। सड़क परिवहन मंत्रालय के विजन को धरातल पर उतारने के लिए अगले 10 साल दो स्पष्ट चरणों में बंटते नजर आ रहे हैं।

​पहला चरण (2026-2031): संक्रमण और स्वीकार्यता का दौर (Transition Phase)

​अगले 5 साल भारतीय सड़कों के लिए 'मंथन' के वर्ष होंगे। हम पेट्रोल-डीजल को पूरी तरह छोड़ नहीं पाएंगे, लेकिन नए विकल्पों को मजबूती से अपनाएंगे।

​दोपहिया वाहनों में क्रांति और जेब का गणित-

इस चरण के अंत तक, यानी 2030-31 तक, पेट्रोल स्कूटर खरीदना आर्थिक रूप से घाटे का सौदा बन जाएगा।

​कीमत: आज जो अच्छी इलेक्ट्रिक स्कूटर 1.20 लाख रुपये की है, वह स्थानीय बैटरी उत्पादन (PLI स्कीम) के कारण 80-90 हजार रुपये की रेंज में आ जाएगी।


रनिंग कॉस्ट-

पेट्रोल स्कूटर चलाने का खर्च जहां ₹2.50 प्रति किमी आता है, वहीं इलेक्ट्रिक का खर्च मात्र 20-30 पैसे प्रति किमी रह जाएगा। मध्यम वर्ग के लिए यह बचत सालाना ₹20,000 से अधिक होगी, जो एक बड़ा आर्थिक प्रोत्साहन है।

हाइड्रोजन की 'भारी' एंट्री-

इन 5 सालों में हाइड्रोजन कारें आम आदमी के गैरेज में नहीं, बल्कि हाईवे पर दिखेंगी। टाटा और रिलायंस के सहयोग से लॉजिस्टिक्स सेक्टर में हाइड्रोजन ट्रकों की एंट्री होगी। डीजल ट्रकों का वर्चस्व टूटना शुरू होगा, जिससे माल ढुलाई की लागत को 14% से घटाकर 9% तक लाने के सरकारी लक्ष्य को मदद मिलेगी।

हाइब्रिड का जलवा-

चार्जिंग स्टेशनों की कमी के डर के चलते, कार खरीदार सीधे ईवी के बजाय 'स्ट्रॉन्ग हाइब्रिड' (Petrol + Electric) कारों की ओर झुकेंगे। यह तकनीक एक पुल का काम करेगी।


दूसरा चरण (2031-36): तकनीकी परिपक्वता और कचरा प्रबंधन-

​यह वह दौर होगा जब भारत 'फॉसिल फ्यूल' (जीवाश्म ईंधन) की बैसाखी फेंककर अपने पैरों पर खड़ा होगा।

कारों की कीमतें और तकनीक-

2032 के बाद, लिथियम-आयन से आगे बढ़कर हम 'सॉलिड स्टेट बैटरी' के युग में प्रवेश करेंगे।


समान कीमत-

इस दौर में इलेक्ट्रिक कार और पेट्रोल कार की शोरूम कीमत लगभग बराबर हो जाएगी। एक मध्यम वर्गीय इलेक्ट्रिक सेडान, जो आज 15-18 लाख रुपए की है, वह तकनीक सस्ती होने पर 10-12 लाख रुपए की रेंज में उपलब्ध होगी।

​चार्जिंग का समय: गाड़ियों को चार्ज होने में घंटों नहीं, बल्कि मिनट लगेंगे। पेट्रोल पंप पूरी तरह से 'ऊर्जा स्टेशनों' में बदल चुके होंगे, जहां एक तरफ हाइड्रोजन डिस्पेंसर होगा और दूसरी तरफ फास्ट चार्जर।

आसमान और जमीन का तालमेल-

यातायात के दबाव को कम करने के लिए बड़े महानगरों में 'एयर टैक्सियां' (eVTOL) एक सामान्य प्रीमियम सेवा बन जाएंगी। हालांकि, यह आम आदमी के लिए नहीं होंगी, लेकिन इनके चलने से सड़कों पर से वीआईपी ट्रैफिक का लोड कम होगा, जिससे सामान्य यातायात सुगम बनेगा।

लिथियम कचरा,सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा-

इस दशक का सबसे स्याह पक्ष 'बैटरियों का कचरा' होगा। 2035 तक लाखों टन पुरानी बैटरियां डंपिंग ग्राउंड में पहुंचने लगेंगी।


रास्ता-

भारत को 'सर्कुलर इकोनॉमी' का ग्लोबल हब बनना होगा। यानी पुरानी बैटरियों से लिथियम, कोबाल्ट और निकल को 95% तक रिकवर करना। यदि इस पर अभी से नीति नहीं बनी, तो हम 'काले धुएं' से बचकर 'जहरीले रसायनों' के जाल में फंस जाएंगे। नितिन गडकरी जी का 'कचरे से कंचन'  का मंत्र यहां सबसे ज्यादा प्रासंगिक होगा।

आम आदमी और पर्यावरण-

​अगले 10 सालों में, एक आम भारतीय के लिए वाहन रखना 'स्टेटस सिंबल' के बजाय एक 'स्मार्ट चॉइस' होगा।


जेब पर असर-

गाड़ी खरीदने की शुरुआती लागत शायद कम न हो, लेकिन उसे चलाने और रखरखाव का खर्च आज के मुकाबले 60% तक कम हो जाएगा।


बेहतर पर्यावरण-

​शहरों का 'एयर क्वालिटी इंडेक्स' सुधरेगा, लेकिन शर्त यह है कि हम अपनी बिजली कोयले से नहीं, बल्कि सौर और पवन ऊर्जा से बनाएं।

​भारत का ऑटो सेक्टर अब सिर्फ 'गाड़ी बेचने' का बाजार नहीं, बल्कि 'ऊर्जा बेचने' का बाजार बन रहा है। यह बदलाव एक चुनौती है, लेकिन अगर नीति और नीयत का सही तालमेल रहा, तो 2036 का भारत दुनिया को ग्रीन मोबिलिटी का पाठ पढ़ाएगा।

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