अयोध्या की उस ‘रहस्यमयी’ रात का सच, जब पीताम्बर की गाँठ में 1600 सिक्के लेकर निकले चार रघुवंशी!
YUGVARTA NEWS
Lucknow, 27 Jan, 2026 07:06 PMविजय दीक्षित | वरिष्ठ पत्रकार
अयोध्या। सरयू के तट पर बसी इस नगरी के हर मंदिर की अपनी एक गूँज है, लेकिन कनक भवन और हनुमानगढ़ी के बीच स्थित 'बड़ी जगह' यानी दशरथ महल की दीवारों में एक ऐसा 'मिडनाइट सस्पेंस' दफन है, जिसने सदियों पहले एक कठोर हृदय व्यापारी को महान संत बना दिया। यह कहानी महज एक लोककथा नहीं, बल्कि उस 'बिंदी वाले तिलक' का आधिकारिक इतिहास है, जो आज भी इस आश्रम की पहचान है।
खाली भंडार और भक्ति की अग्निपरीक्षा
यह उस दौर की बात है जब अयोध्या आज की तरह चकाचौंध से भरी नहीं थी। दशरथ महल के महन्त श्री रामप्रसाद जी महाराज एक 'फक्कड़' संत थे। नियम था कि मंदिर में जो कुछ श्रद्धा से आ गया, वही प्रभु का भोग और संतों का प्रसाद। लेकिन एक दिन नियति ने कठोर परीक्षा ली। मंदिर का दानपात्र खाली रहा। शाम ढली, तो रसोई में एक दाना न था।
रामप्रसाद जी ने पास के ही व्यापारी पलटू बनिया के पास संदेश भेजा कि "भैया! आज हाथ खाली है, प्रभु के भोग के लिए थोड़ा राशन उधार दे दो।" मगर व्यापार के गणित में डूबे पलटू ने दो टूक कह दिया— "महाराज, भक्ति अपनी जगह है और बही-खाता अपनी जगह। यहाँ सौदा सिर्फ नकद होता है।"
उस रात दशरथ महल की रसोई में आग नहीं जली। भगवान को सिर्फ जल का भोग लगा। भूखे पेट संतों ने भजन गाए और रामप्रसाद जी ने भारी मन से प्रभु को शयन कराया, उन्हें वह प्रिय पीताम्बर ओढ़ाया और खुद भी जल पीकर सो गए।
आधी रात की वो दस्तक
चार बालक और एक पीताम्बर।रात के करीब दो बज रहे थे। पलटू बनिया के घर के दरवाजे पर जोर-जोर से दस्तक हुई। झल्लाते हुए पलटू ने दरवाजा खोला, सोचा कोई शरारती तत्व होगा। लेकिन सामने का दृश्य देख उसकी जुबान सिल गई।
सामने चार बेहद सुंदर बालक खड़े थे, जिनकी उम्र मुश्किल से 12 साल रही होगी। ताज्जुब की बात यह थी कि उन चारों ने खुद को एक ही लंबे 'पीताम्बर' (पीले रेशमी वस्त्र) में लपेट रखा था। उनकी आभा ऐसी थी कि पलटू का गुस्सा पल भर में सम्मोहन में बदल गया।
बालकों ने बड़ी अधिकारपूर्ण आवाज में कहा— "अरे ओ पलटू! दरवाजा क्या देख रहा है? हमें रामप्रसाद बाबा ने भेजा है। इस पीताम्बर के कोने में बंधे ये 1600 चाँदी के सिक्के निकाल और गिन ले। ये एडवांस है, कल से आश्रम में राशन की कमी नहीं होनी चाहिए।" ### अंकशास्त्र और *आस्था का मिलन*
पलटू ने कांपते हाथों से पीताम्बर की गाँठ खोली। चाँदी के सिक्कों की खनक से कमरा गूँज उठा। उस जमाने में 1600 सिक्के एक रियासत के बराबर थे। पलटू ने शर्मिंदा होकर कहा— "बच्चों, इतने पैसे? इतने का तो राशन मैं महीनों तक भेजता रहूँगा।" बालकों ने मुस्कुराते हुए कहा— "ठीक है, कल सुबह से ही रसद पहुँच जानी चाहिए।" बालक अंधेरे में ओझल हो गए, लेकिन अपना पीताम्बर वहीं छोड़ गए।
मंगला आरती का 'क्लाइमेक्स'
अगली सुबह मंदिर में हाहाकार मच गया। पुजारी ने देखा कि गर्भगृह से भगवान का पीताम्बर गायब है। चोरी की खबर फैलती कि उससे पहले ही पलटू बनिया बैलगाड़ियों पर राशन लदवाए, फफक-फफक कर रोता हुआ आश्रम पहुँचा।
जब उसने महन्त रामप्रसाद जी के चरणों में वो पीताम्बर रखा और रात का सारा वाकया सुनाया, तो पूरे आश्रम में सन्नाटा पसर गया। रामप्रसाद जी चीख पड़े— "अरे पलटू! तू कितना भाग्यशाली है। जिन प्रभु को मैं उम्र भर रिझाता रहा, वे तुझसे मिलने के लिए आधी रात को नंगे पैर पीताम्बर ओढ़कर चले आए!"
विरासत:जो आज भी दिखती है
इस चमत्कार ने पलटू बनिया को 'संत पलटूदास' बना दिया, जिनकी वाणी आज भी भक्ति साहित्य का अनमोल हिस्सा है। कहा जाता है कि उसी व्याकुलता में जब रामप्रसाद जी को साक्षात दर्शन हुए, तो जगत जननी माता जानकी ने अपने हाथ की उंगली से उनके माथे पर एक बिंदी लगाई थी।
आज भी दशरथ महल (बड़ी जगह) के संत अपने तिलक के बीच में एक छोटी सी बिंदी लगाते हैं। यह बिंदी केवल श्रृंगार नहीं, बल्कि उस रात का गवाह है जब ब्रह्मांड के स्वामी एक कर्ज चुकाने के लिए अयोध्या की गलियों में उतरे थे।


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