अनुभवी दृष्टि ने जिन सूत्रों का चयन किया है, वे आज के अस्थिर समय में किसी 'कंपास' की तरह सही दिशा दिखाने में सक्षम है
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Lucknow, 31 Jan, 2026 12:02 PMचाणक्य नीति : जीवन प्रबंधन और सफलता के शाश्वत सिद्धांत
विशेष आलेख: विजय दीक्षित, सीनियर एडिटर अमृत बाजार पत्रिका/ युगान्तर समूह कोलकाता
भारतीय कूटनीति और अर्थशास्त्र के पितामह आचार्य चाणक्य ने 'चाणक्य नीति' के माध्यम से मानवता को वह मार्ग दिखाया है, जिस पर चलकर एक साधारण बालक भी 'सम्राट' बन सकता है। उनके विचार केवल सत्ता प्राप्ति के लिए नहीं, बल्कि श्रेष्ठ जीवन जीने के व्यावहारिक सूत्र हैं।
1. प्रार्थना और अंतर्मन का परिमार्जन
आचार्य चाणक्य के अनुसार, अध्यात्म प्रदर्शन की वस्तु नहीं, बल्कि आत्म-सुधार की प्रक्रिया है। जब हम प्रार्थना करते हैं, तो हमारा लक्ष्य प्रकृति के नियमों को बदलना नहीं, बल्कि स्वयं के स्वभाव को उन नियमों के अनुकूल ढालना होना चाहिए।
सूत्र: "सत्यं माता पिता ज्ञानं धर्मो भ्राता दया सखा।"
(सत्य मेरी माता है, ज्ञान पिता है, धर्म भाई है और दया ही मेरा सच्चा मित्र है।)
भावार्थ: जब मनुष्य के भीतर ये दैवीय गुण आते हैं, तभी उसकी प्रार्थना सफल मानी जाती है और वह विनम्र व मानसिक रूप से सुदृढ़ बनता है।
2. सम्मान का सामाजिक गणित
समाज में सम्मान का आदान-प्रदान एक दर्पण की तरह है। चाणक्य स्पष्ट करते हैं कि जो व्यक्ति स्वयं के चरित्र और मर्यादा का सम्मान नहीं करता, वह दूसरों को सम्मान देने की उदारता कभी नहीं दिखा सकता।
सूत्र: "आचारः कुलमाख्याति देशमाख्याति भाषणम्।"
(आचरण से कुल का और भाषा से देश का पता चलता है।)
भावार्थ: सम्मान वही दे सकता है जिसके संस्कारों में शालीनता हो। घटिया मानसिकता के लोग केवल दूसरों को नीचा दिखाकर अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने का असफल प्रयास करते हैं।
3. संकट में अवसर और संघर्ष की शक्ति
विपत्ति मनुष्य के लिए कसौटी के समान है। चाणक्य का मानना था कि जो समस्याओं से घबराकर पीछे हट जाते हैं, वे साधारण बनकर रह जाते हैं, लेकिन जो समस्याओं के भीतर छिपे अवसरों को पहचानते हैं, वे इतिहास रचते हैं।
सूत्र: "यथा चतूर्भिः कनकं परीक्ष्यते निर्घर्षणच्छेदनतापताडनैः।"
(जैसे सोने की परीक्षा घिसने, काटने, तपाने और पीटने से होती है, वैसे ही व्यक्ति की परीक्षा उसके त्याग, शील, गुण और कर्म से होती है।)
भावार्थ: यदि कष्ट बड़ा है, तो समझ लीजिए कि नियति आपको किसी बड़ी सफलता के लिए तराश रही है।
4. कृतज्ञता बनाम स्वार्थ : जीवन का कठोर सत्य
चाणक्य ने उस मानवीय मनोविज्ञान पर प्रहार किया है जहाँ स्वार्थ सिद्ध होते ही लोग सहारा देने वालों को भूल जाते हैं। 'अंधे और लाठी' का उदाहरण आज के पेशेवर और व्यक्तिगत रिश्तों पर सटीक बैठता है।
सूत्र: "उपकारिषु यः साधुः साधुत्वे तस्य को गुणः।"
(उपकार करने वालों के साथ तो सभी अच्छा व्यवहार करते हैं, श्रेष्ठ वह है जो अपकारियों के प्रति भी समता रखे, परंतु कृतघ्नता से सावधान रहे।)
भावार्थ: जो व्यक्ति आपकी परिस्थिति को अपनाए बिना आपको बदलना चाहता है, वह आपका हितैषी नहीं, बल्कि आपको 'मानसिक गुलाम' बनाना चाहता है।
5. ज्ञान की सार्वभौमिकता
ज्ञान कहीं से भी मिले, उसे ग्रहण करने में संकोच नहीं करना चाहिए। चाणक्य ने 'विष से अमृत' निकालने की जो बात कही, वह आज के सूचना युग में 'फिल्टर' की तरह काम करती है।
सूत्र: "विषादप्यमृतं ग्राह्यं बालादपि सुभाषितम्।"
(विष से भी अमृत, गंदगी से भी सोना और छोटे बालक से भी यदि अच्छी सीख मिले, तो उसे ग्रहण कर लेना चाहिए।)
6. विद्यार्थी और अनुशासन : सफलता की पहली शर्त
विद्यार्थी जीवन के लिए चाणक्य के नियम अत्यंत कठोर परंतु परिणामोन्मुखी हैं। सुख और विद्या एक साथ नहीं चल सकते।
सूत्र: "सुखार्थिनः कुतो विद्या कुतो विद्यार्थिनः सुखम्।"
(सुख चाहने वाले को विद्या कहाँ और विद्या चाहने वाले को सुख कहाँ।)
भावार्थ: निद्रा, क्रोध, लोभ और स्वाद का त्याग ही एक विद्यार्थी को महानता की ओर ले जाता है।
7. कर्म प्रधानता : राशि नहीं, पुरुषार्थ बड़ा है
अक्सर लोग अपने भाग्य और राशियों को दोष देते हैं। चाणक्य ने भगवान राम और रावण का उदाहरण देकर यह सिद्ध किया कि एक ही राशि होने के बाद भी उनके 'कर्मों' ने उनके भाग्य का फैसला किया।
सूत्र: "यथा धेनुसहस्रेषु वत्सो विन्दति मातरम्। तथा पूर्वकृतं कर्म कर्तारमनुगच्छति॥"
(जैसे हजारों गायों के बीच बछड़ा अपनी माँ को खोज लेता है, वैसे ही व्यक्ति के कर्म उसके पीछे-पीछे चलते हैं।)
भावार्थ: कर्म ही भाग्य का असली निर्माता है। वर्तमान में जीना और कर्म करना ही सुखी रहने का एकमात्र मंत्र है।
8. नेतृत्व सूत्र : चंद्रगुप्त के लिए संदेश
अंत में, नेतृत्व और प्रबंधन के वे सूत्र जो चाणक्य ने सम्राट चंद्रगुप्त को दिए, वे आज के कॉरपोरेट और राजनीतिक जगत के लिए 'मैनेजमेंट गुरु' के मंत्र हैं:
* शक्ति से पहले 'नीति' को मजबूत करो।
* निर्णय भावनाओं से नहीं, विवेक से लो।
* अनुशासन ही किसी भी 'साम्राज्य' या 'संस्था' की नींव है।
निष्कर्ष:
आचार्य चाणक्य के ये विचार केवल पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि आचरण में उतारने के लिए हैं। एक सजग समाज के निर्माण के लिए हमें 'चाणक्य नीति' के इन शाश्वत सत्यों को आत्मसात करना होगा। जैसा कि आचार्य कहते हैं— मुस्कान और संतोष ही सबसे शक्तिशाली प्रतिशोध हैं।
विशेष आलेख: विजय दीक्षित, सीनियर एडिटर अमृत बाजार पत्रिका/ युगान्तर समूह कोलकाता


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