एलपीजी तक पहुंच बढ़ी, 70 फीसदी शहरी गरीब परिवार और 23 फीसदी ग्रामीण परिवार सिर्फ एलपीजी का उपयोग करते हैं: सीईईडब्ल्यू अध्ययन
-घोषणा की प्रक्रिया आसान बनाने के लिए 2021 में नीति में बदलाव के बावजूद सर्वेक्षण में शामिल 4 प्रतिशत से कम प्रवासी श्रमिक प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना (PMUY) में पंजीकृत हैं।_ _80 प्रतिशत लोगों ने कहा कि अगर 14.2 किलोग्राम के सिलेंडर की कीमत 400 रुपये हो तो वे केवल एलपीजी का उपयोग करने लगेंगे।_
YUGVARTA NEWS
Lucknow, 8 Sep, 2026 09:22 AMनई दिल्ली, 07 सितंबर 2026: एलपीजी (LPG) की उपलब्धता ग्रामीण भारत, शहरों की अनौपचारिक बस्तियों व प्रवासी श्रमिकों की बस्तियों में काफी मजबूती से फैल चुकी है, लेकिन उस रफ्तार से औपचारिक व पंजीकृत कनेक्शन नहीं बढ़े हैं। प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना (PMUY) व एलपीजी के व्यापक विस्तार ने उपलब्धता को बहुत अधिक बढ़ाया है। स्वच्छ ईंधन से खाना पकाने (clean cooking) की नीति का अगला कदम एलपीजी के निरंतर उपयोग, इसे किफायती बनाने, औपचारिक पहुंच बढ़ाने व अंतिम छोर तक आपूर्ति की समस्या को सुलझाना होगा। इन अध्ययनों में छह राज्यों के 2,200 से अधिक ग्रामीण परिवार, अनौपचारिक बस्तियों के 1,100 से अधिक परिवार व 10 शहरों के 1,000 से अधिक प्रवासी श्रमिक शामिल हैं। ये जानकारियां क्लीन एयर होराइजंस (Clean Air Horizons) कार्यक्रम में 'काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर' (CEEW) की ओर से जारी तीन नए स्वतंत्र अध्ययन से सामने आई हैं। जागरूकता की कमी व अंतिम छोर तक डिलीवरी नेटवर्क की समस्या से बनी कमी को अनौपचारिक कनेक्शन भर रहे हैं, जो किराना दुकानों, सड़क किनारे के डीलरों या अनधिकृत डिस्ट्रीब्यूटरों से अधिक कीमत पर खरीदे जाते हैं। प्रवासी श्रमिकों को सबसे ज्यादा समस्या का सामना करना पड़ता है। सर्वेक्षण में शामिल 79 प्रतिशत प्रवासी एलपीजी यूजर्स के पास कोई औपचारिक कनेक्शन नहीं मिला, जबकि शहरी अनौपचारिक बस्तियों में इनकी संख्या 11 प्रतिशत रही। इस योजना को प्रवासी परिवारों तक पहुंचाने के लिए 2021 में नीति में बदलाव किया गया था, लेकिन 4 प्रतिशत से भी कम प्रवासी श्रमिक पीएमयूवाई में पंजीकृत मिले। एलपीजी के किफायती होने के मामले में तीनों अध्ययनों के निष्कर्ष एक जैसे हैं। सर्वेक्षण में शामिल ग्रामीण परिवारों, शहरी अनौपचारिक बस्तियों के परिवारों व प्रवासी श्रमिकों में से कम से कम 80 प्रतिशत ने कहा कि 14.2 किलो के एलपीजी सिलेंडर के रीफिल की कीमत 400 रुपये होने पर वे केवल एलपीजी का उपयोग करने लगेंगे। तीनों समूहों में भुगतान करने की इच्छा (willingness to pay) का मध्य मान (median) 500 रुपये रहा। ये दोनों आंकड़े पीएमयूवाई के तहत सब्सिडी के बाद सिलेंडर की मौजूदा प्रभावी कीमत 642 रुपये से कम हैं। सीईईडब्ल्यू के सर्वेक्षण में शामिल हर समूह के लिए यह उपलब्धता अलग-अलग स्वरूप में होती है। ग्रामीण परिवारों में 73 प्रतिशत ने पिछले 90 दिनों में एलपीजी का उपयोग किया, लेकिन सिर्फ 23 प्रतिशत पूरी तरह से इस पर निर्भर रहे। आधे परिवार आज भी जलाऊ लकड़ी को अपना मुख्य ईंधन बनाए हुए हैं, और एलपीजी यूजर्स में से सिर्फ 47 प्रतिशत को घर तक डिलीवरी मिलती है। रीफिल की कीमत और अंतिम छोर तक रीफिल की डिलीवरी यहां सबसे बड़ी चुनौतियां हैं। शहरी अनौपचारिक बस्तियों के परिवारों में एलपीजी का उपयोग कहीं अधिक है, यहां 70 प्रतिशत परिवार सिर्फ इसी का उपयोग करते हैं, लेकिन जिनके पास औपचारिक कनेक्शन नहीं है, उनमें से 31 प्रतिशत का कहना है कि निवास प्रमाणपत्र जैसे दस्तावेज न होने के कारण उन्हें कनेक्शन नहीं मिल सका। इसका परिणाम यह रहा कि 11 प्रतिशत परिवार सिलेंडर अनौपचारिक रूप से खरीदते हैं और सर्वेक्षण के समय की 803 रुपये की खुदरा कीमत के मुकाबले 1,040 रुपये चुकाते हैं। प्रवासी श्रमिकों के लिए यह उपलब्धता रहने के ठिकाने से गहरे जुड़ी है। फुटपाथ या खुले स्थानों में रहने वाले 70 प्रतिशत श्रमिक केवल ठोस ईंधन पर निर्भर हैं, जबकि किराये के मकान में रहने वालों में यह आंकड़ा 11 प्रतिशत है। सर्वेक्षण में शामिल प्रवासियों में जो अनौपचारिक रूप से एलपीजी खरीदते हैं, वे 71 रुपये प्रति किलो की कीमत चुकाते हैं, जो औपचारिक कनेक्शन से मिलने वाली 59 रुपये प्रति किलो की कीमत से 20 प्रतिशत से अधिक है। *प्रार्थना बोरा, फेलो, सीईईडब्ल्यू*, ने कहा, "स्वच्छ हवा को इस बात से अलग नहीं किया जा सकता कि लोग कैसे खाना पकाते हैं, कैसे काम करते हैं और कैसा जीवन जीते हैं। ये अध्ययन दिखाते हैं कि एलपीजी कनेक्शन देना सिर्फ पहला कदम है। अगर परिवार नियमित रीफिल का खर्च नहीं उठा पाते, प्रवासियों को पीएमयूवाई के तहत औपचारिक कनेक्शन की जानकारी नहीं है, या सिलेंडर ग्रामीण घरों तक विश्वसनीय ढंग से नहीं पहुंचते हैं, तो परिवारों के सामने प्रदूषण फैलाने वाले ईंधन का जोखिम बना रहता है। इसलिए भारत के क्लीन एयर एजेंडे को उपलब्धता से आगे बढ़कर देखना होगा कि स्वच्छ ईंधन से खाना पकाना किफायती है या नहीं, भरोसेमंद है या नहीं, और उसका उपयोग निरंतर हो रहा है या नहीं।" *अभिषेक कर, फेलो, सीईईडब्ल्यू*, तीनों अध्ययनों के सह-लेखक भी हैं, ने कहा, "स्वच्छ ईंधन से खाना पकाने की नीति को अब कनेक्शन की गिनती से आगे बढ़कर निरंतर उपयोग बढ़ाने की तरफ बढ़ना होगा। ग्रामीण परिवारों के लिए किफायती रीफिल व घर तक डिलीवरी सर्वाधिक मायने रखती है, शहरी गरीब परिवारों के लिए दस्तावेजों व माइक्रो-पेमेंट जैसे भुगतान के नए तरीकों की जरूरत है, और प्रवासियों के लिए अतिरिक्त सब्सिडी व जागरूकता जैसी कड़ियां जोड़ने की जरूरत है। उदाहरण के लिए, प्रवासी एलपीजी यूजर्स में से अधिकतर अनौपचारिक रूप से खरीदते हैं और औपचारिक सिलेंडर खरीद सकने वाले आम यूजर्स के मुकाबले प्रति किलो 20 प्रतिशत से अधिक कीमत चुकाते हैं। स्वच्छ ईंधन से खाना पकाने की दिशा में अगले चरण की कार्रवाई इन जमीनी हकीकतों से तय होनी चाहिए।" सीईईडब्ल्यू के तीनों अध्ययन अलग-अलग पक्षों के लिए अलग-अलग उपाय सुझाते हैं। तीनों सर्वेक्षणों में सामने आया है कि रीफिल की कीमत 400 रुपये यूजर्स के लिए सबसे किफायती सीमा है, जिससे केवल एलपीजी का उपयोग सुनिश्चित हो सकता है, इसलिए पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय को पीएमयूवाई की सब्सिडी को प्रति सिलेंडर करीब 200 रुपये बढ़ाने पर विचार करना चाहिए। तेल विपणन कंपनियों को नियोक्ताओं व ठेकेदारों के साथ मिलकर प्रवासियों व उनके परिवारों की पीएमयूवाई के तहत विशेष पंजीकरण अभियानों में मदद करनी चाहिए, और प्रवासी बहुल इलाकों में पे-एज-यू-गो स्मार्ट-मीटर एलपीजी कियोस्क (pay-as-you-go smart-meter LPG kiosks) का पायलट चलाना चाहिए, जिनसे आंशिक व लचीली रीफिल संभव हो सके। घर तक रीफिल की डिलीवरी में अंतर को भरने के लिए डिस्ट्रीब्यूटरों को अलग-अलग दरों वाला कमीशन मॉडल (differentiated commission model) अपनाना चाहिए, जो सीईईडब्ल्यू ने 2024 में सुझाया था और जिसमें दूरदराज के या कम खपत वाले ग्रामीण ग्राहकों तक पहुंचने वाले डिस्ट्रीब्यूटरों को टॉप-अप मिलता है। शहरी स्थानीय निकायों व आवास विभागों को अनौपचारिक बस्तियों के परिवारों के औपचारिक एलपीजी पंजीकरण को प्राथमिकता देनी चाहिए, जहां निवास की अस्थिरता ठोस ईंधन पर निर्भर रहने के सबसे बड़े कारणों में से एक है। *Read the full studies released at the event:* 1. Subsidised, Not Sustained: Rural Cooking-Fuel Usage Trends in Six Indian States, by Rahul Das, Anwesha Sarma and Abhishek Kar https://www.ceew.in/publications/clean-cooking-fuels-rural-lpg-survey 2. Are Clean Cooking Fuels Reaching India's Urban Poor? Access and Willingness to Pay Across 10 Indian Cities, by Hladinee Borgohain, Adya Sharma, Rahul Das and Abhishek Kar https://www.ceew.in/publications/clean-cooking-fuels-in-Indian-urban-slums 3. Understanding Clean Cooking Fuel Usage Among Migrants: Evidence from Willingness to Pay Surveys in 10 Indian Cities, by Surya Shekhar Auddy, Varian Crasto and Abhishek Kar https://www.ceew.in/publications/migrant-workers-lpg-access-india 4. Whose Air? Assessing Equity in India’s Air Quality Policies by Niharika Tyagi and Om Prakash Singh https://www.ceew.in/publications/gender-equity-air-quality-policies-india 5. Zero Waste Schools Manual, developed by CEEW’s Zero Waste Schools Programme https://www.ceew.in/publications/zero-waste-manual-schools-waste-audit *Note*: The findings from the clean cooking studies, and the recommendations drawn from them, are based on self-reported responses from survey respondents, and should not be interpreted as observed behaviour or as a record of actual purchase and payment decisions for cooking fuels.



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