वडनगर से रायसीना हिल्स तक: नरेंद्र मोदी के 76 साल और सियासत का सफर

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Lucknow, 16 Sep, 2026 07:08 PM
वडनगर से रायसीना हिल्स तक: नरेंद्र मोदी के 76 साल और सियासत का सफर

नई दिल्ली, सितंबर 16, 2026 : 17 सितंबर 1950 को गुजरात के वडनगर में जन्मे नरेंद्र दामोदरदास मोदी 17 सितंबर 2026 को 76 वर्ष के हो जाएंगे। एक छोटे शहर में साधारण पारिवारिक पृष्ठभूमि से शुरू हुई उनकी कहानी आज भारतीय राजनीति के सबसे लंबे और प्रभावशाली राजनीतिक सफरों में गिनी जाती है। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को समझने के लिए केवल 2014 के बाद के उनके कार्यकाल को देखना पर्याप्त नहीं है। उनकी राजनीतिक यात्रा कई दशक पहले शुरू हुई थी—पहले एक स्वयंसेवक के रूप में, फिर संगठनकर्ता के तौर पर, उसके बाद भारतीय जनता पार्टी के रणनीतिकार, गुजरात के मुख्यमंत्री और अंततः देश के प्रधानमंत्री के रूप में।


नरेंद्र मोदी का जन्म वडनगर में दामोदरदास मूलचंद मोदी और हीराबेन मोदी के परिवार में हुआ। प्रधानमंत्री कार्यालय की जीवनी के अनुसार, उनका बचपन वडनगर में बीता और परिवार की चाय की दुकान में उन्होंने भी काम किया। आगे चलकर उन्होंने उच्च शिक्षा हासिल की और गुजरात विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में एमए किया। बचपन और युवावस्था में ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से उनका संपर्क बना, जिसने उनके सार्वजनिक जीवन को एक दिशा दी।


1970 के दशक में गुजरात का छात्र आंदोलन नरेंद्र मोदी के शुरुआती सार्वजनिक जीवन का महत्वपूर्ण पड़ाव बना। 1974 के नवनिर्माण आंदोलन के दौरान छात्र राजनीति और जनआंदोलन को करीब से देखने का अवसर उन्हें मिला। आपातकाल के दौरान भी उन्होंने गुजरात में विपक्षी गतिविधियों से जुड़े संगठनात्मक काम किए। उपलब्ध विवरणों के मुताबिक, 1975 में वे गुजरात लोक संघर्ष समिति के महासचिव बने और भूमिगत रहकर आपातकाल विरोधी गतिविधियों में भूमिका निभाई। यह दौर उनके लिए केवल आंदोलन का अनुभव नहीं था, बल्कि संगठन और राजनीतिक नेटवर्क तैयार करने का शुरुआती चरण भी था।


RSS में प्रचारक के रूप में काम करते हुए मोदी ने संगठन निर्माण और कार्यकर्ता नेटवर्क तैयार करने का अनुभव हासिल किया। 1978 में उन्हें RSS में क्षेत्रीय संगठन की जिम्मेदारी मिली और बाद में दिल्ली में भी उन्होंने संगठनात्मक कार्य किया। 1980 के दशक के मध्य में उन्हें BJP के साथ काम करने के लिए भेजा गया। 1987 में उन्होंने बीजेपी की गुजरात इकाई में संगठन सचिव के रूप में काम संभाला और अहमदाबाद नगर निगम चुनाव में पार्टी के अभियान को संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके बाद पार्टी में उनकी जिम्मेदारियां लगातार बढ़ती गईं।


1990 में मोदी बीजेपी की राष्ट्रीय चुनाव समिति का हिस्सा बने। इसी दौर में उन्होंने लालकृष्ण आडवाणी की राम रथ यात्रा और बाद में मुरली मनोहर जोशी की एकता यात्रा के संगठनात्मक प्रबंधन में भूमिका निभाई। 1995 में उन्हें बीजेपी का राष्ट्रीय सचिव बनाया गया और हरियाणा तथा हिमाचल प्रदेश में पार्टी की गतिविधियों की जिम्मेदारी दी गई। 1998 में वे बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव और संगठन की जिम्मेदारी संभालने वाले प्रमुख नेताओं में शामिल हुए। प्रधानमंत्री कार्यालय के आधिकारिक विवरण के अनुसार, 1998 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी के संगठनात्मक विस्तार में भी उनकी भूमिका रही।


सितंबर 2001 में नरेंद्र मोदी के राजनीतिक जीवन ने एक बड़ा मोड़ लिया। उस समय गुजरात में नेतृत्व परिवर्तन के बीच उन्हें राज्य की जिम्मेदारी दी गई और 7 अक्टूबर 2001 को उन्होंने गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। यह उनके लिए संगठन की राजनीति से सीधे शासन की राजनीति में प्रवेश था। इसके बाद उन्होंने 2002, 2007 और 2012 के विधानसभा चुनावों में बीजेपी का नेतृत्व किया और लगातार तीन बार गुजरात के मुख्यमंत्री बने। 2003 में उनकी सरकार ने Vibrant Gujarat Global Summit की शुरुआत की, जो बाद में निवेश और उद्योग से जुड़े बड़े आयोजनों में बदल गया।


मुख्यमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी ने औद्योगिक निवेश, बुनियादी ढांचे, बिजली, सड़क और प्रशासनिक सुधारों पर जोर दिया। इसी अवधि में गुजरात के विकास मॉडल को राष्ट्रीय राजनीति में बीजेपी ने प्रमुखता से पेश किया। हालांकि, उनके मुख्यमंत्री कार्यकाल के साथ 2002 के गुजरात दंगों को लेकर गंभीर राजनीतिक और सार्वजनिक विवाद भी जुड़े रहे। इन घटनाओं और सरकार की भूमिका को लेकर वर्षों तक अलग-अलग राजनीतिक तथा कानूनी बहस चलती रही। इसलिए गुजरात का उनका दौर उपलब्धियों के साथ विवादों से जुड़ा एक महत्वपूर्ण राजनीतिक अध्याय भी रहा।


गुजरात में लगातार तीन चुनाव जीतने के बाद नरेंद्र मोदी की राष्ट्रीय राजनीति में भूमिका तेजी से बढ़ी। 2013 में बीजेपी ने उन्हें प्रधानमंत्री पद के लिए अपना प्रमुख चुनावी चेहरा बनाया। 2014 का लोकसभा चुनाव उनके नेतृत्व में लड़ा गया और बीजेपी ने 282 सीटों के साथ अपने दम पर बहुमत हासिल किया। 26 मई 2014 को नरेंद्र मोदी ने भारत के 15वें प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली। इस तरह करीब तीन दशक की संगठनात्मक राजनीति और 13 साल के मुख्यमंत्री कार्यकाल के बाद वह राज्य की राजनीति से राष्ट्रीय सत्ता के केंद्र तक पहुंचे।


प्रधानमंत्री बनने के बाद उनकी सरकार ने वित्तीय समावेशन, स्वच्छता, ग्रामीण सुविधाओं, स्वास्थ्य, डिजिटल भुगतान और विनिर्माण को प्रमुख प्राथमिकताओं में रखा। प्रधानमंत्री जनधन योजना, स्वच्छ भारत अभियान, प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना, आयुष्मान भारत और मेक इन इंडिया जैसी पहलों ने सरकार के शुरुआती वर्षों की नीति दिशा तय की। 2016 में शुरू हुआ यूपीआई बाद में भारत के डिजिटल भुगतान ढांचे की सबसे प्रमुख पहलों में शामिल हुआ। इसी अवधि में राष्ट्रीय राजमार्ग, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को लेकर भी विस्तार हुआ।


2019 में बीजेपी ने 303 लोकसभा सीटें जीतकर लगातार दूसरी बार स्पष्ट बहुमत हासिल किया और नरेंद्र मोदी ने दूसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। इस कार्यकाल में सरकार ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 के अधिकांश प्रावधान हटाने, जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन कानून, नागरिकता संशोधन कानून, तीन तलाक पर कानून और नारी शक्ति वंदन अधिनियम जैसे कई बड़े फैसले किए। 2016 की सर्जिकल स्ट्राइक और 2019 की बालाकोट एयर स्ट्राइक भी उनकी सरकार की सुरक्षा नीति के प्रमुख घटनाक्रम रहे।


2024 का लोकसभा चुनाव नरेंद्र मोदी के राजनीतिक सफर में एक और महत्वपूर्ण पड़ाव बना। बीजेपी को अपने दम पर बहुमत नहीं मिला, लेकिन राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने सरकार बनाने के लिए आवश्यक बहुमत हासिल किया। इसके बाद 9 जून 2024 को नरेंद्र मोदी ने लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। प्रधानमंत्री कार्यालय के अनुसार, वह 2024 में तीसरे कार्यकाल के लिए शपथ लेने वाले प्रधानमंत्री बने।


नरेंद्र मोदी की 76 वर्ष की उम्र तक की राजनीतिक यात्रा को केवल प्रधानमंत्री के रूप में उनके कार्यकाल से नहीं समझा जा सकता। वडनगर का बचपन, छात्र आंदोलनों का अनुभव, RSS में प्रचारक के रूप में संगठनात्मक जीवन, बीजेपी में लंबे समय तक पर्दे के पीछे संगठन खड़ा करने की भूमिका, राष्ट्रीय महासचिव के रूप में चुनावी रणनीति, गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में 13 साल और फिर 2014 से प्रधानमंत्री के रूप में उनका सफर—इन सभी चरणों ने उनकी राजनीतिक पहचान को आकार दिया। प्रधानमंत्री के रूप में जनधन, उज्ज्वला, स्वच्छ भारत, आयुष्मान भारत, यूपीआई और बुनियादी ढांचे के विस्तार जैसी पहलों के साथ-साथ रोजगार, महंगाई, कृषि, सामाजिक असमानता, शिक्षा, स्वास्थ्य, चीन के साथ सीमा संबंध और पर्यावरण जैसी चुनौतियां भी उनके राजनीतिक रिकॉर्ड का हिस्सा हैं। ऐसे में 76वें जन्मदिन पर उनकी यात्रा को समझने का सबसे व्यापक तरीका यही है कि उसे एक व्यक्ति के सत्ता तक पहुंचने की कहानी के बजाय पांच दशक से अधिक लंबे संगठनात्मक और राजनीतिक सफर के रूप में देखा जाए।


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