मानवता की एकता ही भारत की पारंपरिक सोच : मोहन भागवत

न्यूयॉर्क में ‘एक विश्व, एक मानवता’ कार्यक्रम में RSS प्रमुख ने 1996 की विमान दुर्घटना के बाद स्वयंसेवकों की निस्वार्थ सेवा का किया उल्लेख

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Lucknow, 30 Aug, 2026 09:11 PM
मानवता की एकता ही भारत की पारंपरिक सोच : मोहन भागवत

न्यूयॉर्क। दुनिया की सबसे भीषण विमान दुर्घटनाओं में शामिल चर्खी दादरी हादसे की याद करीब तीन दशक बाद एक बार फिर सामने आई। RSS प्रमुख मोहन भागवत ने न्यूयॉर्क में आयोजित ‘एक विश्व, एक मानवता’ कार्यक्रम में 1996 में हरियाणा के चर्खी दादरी में हुए विमान हादसे का जिक्र करते हुए दुर्घटना के बाद के भयावह हालात और राहत कार्यों को याद किया। उन्होंने बताया कि हादसे के बाद RSS स्वयंसेवक घटनास्थल पर पहुंचे और घायलों की मदद से लेकर शवों को निकालने तथा मृतकों के परिजनों की सहायता करने तक सेवा कार्य में जुट गए थे।

हादसे के बाद हर तरफ था तबाही का मंजर

भागवत ने उस हादसे के बाद की स्थिति को याद करते हुए कहा कि दुर्घटना के बाद बड़ी संख्या में लोग घायल हुए थे। घटनास्थल पर शवों को निकालने और उनकी पहचान करने की चुनौती थी। अपने प्रियजनों की तलाश में दूर-दराज से परिवार वहां पहुंच रहे थे। ऐसे कठिन समय में RSS के स्वयंसेवकों ने लोगों की सहायता शुरू की।

स्वयंसेवकों ने घायलों के उपचार में मदद की। उन्होंने मृतकों के शवों को निकालने में सहयोग किया और घटनास्थल पर पहुंचे परिजनों को अपने प्रियजनों की पहचान करने में सहायता दी। इसके साथ ही मृतकों के अंतिम संस्कार की व्यवस्था में भी सहयोग किया गया।

“हमने उस समय कभी नहीं सोचा कि ये मुस्लिम हैं”

भागवत ने कहा कि दुर्घटना में मारे गए लोगों में बड़ी संख्या मुस्लिम यात्रियों की थी, लेकिन स्वयंसेवकों ने सेवा करते समय उनकी धार्मिक पहचान को महत्व नहीं दिया।

भागवत ने कहा, “दो विमान भारत के हिस्से हरियाणा में दादरी नामक स्थान के ऊपर टकरा गए। दोनों विमान अरब देशों के थे। अधिकांश यात्री मुस्लिम थे। उस टक्कर के बाद हमारे स्वयंसेवक सबसे पहले वहां पहुंचे और उन्होंने सेवा की। उन्होंने घायलों के उपचार में मदद की… उनके शवों को निकाला, जब उनके रिश्तेदार आए तो अंतिम संस्कार की व्यवस्था में सहायता की और उनकी पहचान कराने में मदद की। हमने उस समय कभी नहीं सोचा कि ये मुस्लिम हैं।”

12 नवंबर 1996 को हुई थी दुर्घटना

चर्खी दादरी विमान हादसा 12 नवंबर 1996 को हुआ था। हरियाणा के चर्खी दादरी के आसमान में सऊदी अरब की बोइंग 747 और कजाखस्तान एयरलाइंस के इल्यूशिन आईएल-76 विमान आपस में टकरा गए थे।

दोनों विमानों में सवार किसी भी व्यक्ति की जान नहीं बच सकी। दुर्घटना में कुल 349 लोगों की मौत हुई थी। यह हादसा विमानन इतिहास की सबसे घातक मध्य-हवाई टक्करों में शामिल है।

त्रासदी के बाद इंसानियत को बताया अहम

भागवत के लिए चर्खी दादरी हादसा केवल बड़ी संख्या में लोगों की मौत की त्रासदी नहीं था। उन्होंने दुर्घटना के बाद सामने आए मानवीय सहयोग को भी महत्वपूर्ण बताया।

उन्होंने कहा कि दुर्घटनास्थल पर मौजूद लोगों को तत्काल मदद की जरूरत थी। परिवार अपने प्रियजनों की जानकारी और पहचान के लिए वहां पहुंच रहे थे। मृतकों को सम्मानजनक अंतिम विदाई दिलाना भी जरूरी था।

भागवत ने कहा कि स्वयंसेवकों ने किसी व्यक्ति की मदद करने से पहले उसकी पहचान या धर्म के बारे में सवाल नहीं किया।

“RSS को बदले में कुछ नहीं चाहिए”

RSS प्रमुख ने कहा कि संगठन ऐसे सेवा कार्यों का प्रचार नहीं करता, क्योंकि वह सेवा के बदले किसी तरह की अपेक्षा नहीं रखता।

उन्होंने कहा, “प्रमुख रूप से काम करने वाला संगठन RSS था। हम यह इसलिए कर सके क्योंकि हम राजनीति में नहीं हैं। और हम इन चीजों को प्रसिद्ध करने की कोशिश नहीं करते, क्योंकि हमें इससे कुछ नहीं चाहिए। कोई बदला नहीं… संघ में हम केवल देते हैं। हमें कुछ नहीं चाहिए। यही कारण है कि प्रचार के मामले में हम बहुत पीछे हैं।”

तीन देशों के दौरे पर हैं मोहन भागवत

मोहन भागवत अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन के तीन देशों के वैश्विक संपर्क दौरे पर हैं। न्यूयॉर्क में कार्यक्रम इसी दौरे की शुरुआत के दौरान आयोजित किया गया। RSS के शताब्दी वर्ष के आयोजनों के तहत यह वैश्विक संपर्क अभियान चलाया जा रहा है। विदेशों में स्थानीय संगठनों की ओर से मिले निमंत्रण के बाद इस यात्रा का आयोजन किया गया है।

RSS को लेकर बनी धारणाओं पर भी बोले भागवत

कार्यक्रम में भागवत ने RSS को लेकर बनी धारणाओं पर भी अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि संगठन के बारे में कई ऐसी धारणाएं बनाई गई हैं, जो उनके अनुसार जमीन पर किए जा रहे कार्यों को सही तरीके से नहीं दर्शातीं।

उन्होंने कहा, “गलत नैरेटिव के कारण कई धारणाएं बनाई गई हैं। लेकिन जब आप हमारे पास आते हैं और हमें अंदर से देखते हैं, तो एक दिन में ही उन सभी धारणाओं पर विश्वास खत्म हो जाएगा।”

सामाजिक बदलाव की शुरुआत समाज से होनी चाहिए

भागवत ने कहा कि सामाजिक एकता और बदलाव केवल राजनीतिक व्यवस्था के जरिए संभव नहीं है। उनके अनुसार लोकतंत्र में राजनीति जनमत से प्रभावित होती है और यदि समाज में किसी विषय पर मजबूत जनमत बनता है तो राजनीतिक नेतृत्व भी उसके विपरीत जाने का जोखिम नहीं उठाता।

उन्होंने कहा, “आज राजनीति, खासकर लोकतंत्र में, जनता की राय पर निर्भर करती है। यदि जनमत है तो कोई भी राजनेता उसके खिलाफ जाने का साहस नहीं करेगा। इसलिए मेरा मानना है कि आज एक साझा संकल्प लेने के बाद हमें इन समाजों में काम करना होगा और हमें सबसे पहले स्थानीय स्तर पर काम करना होगा।”

राजनीतिक सत्ता नहीं, सामाजिक जुड़ाव जरूरी

भागवत ने कहा कि सामाजिक सद्भाव केवल राजनीतिक शक्ति हासिल करने से नहीं बनाया जा सकता। इसके लिए समाज के भीतर रोजमर्रा के व्यवहार, आपसी संवाद और सेवा की भावना को मजबूत करना जरूरी है।

उन्होंने भारत की पारंपरिक सोच का उल्लेख करते हुए मानवता की एकता को व्यक्तिगत हितों से ऊपर रखने की बात कही।

भागवत ने कहा, “यह भारत की पारंपरिक सोच है—मानवता की एकता। हमारे सभी नेताओं ने अलग-अलग समय पर इस बात पर जोर दिया है। आजादी के बाद हमें संविधान मिला, जो इस बात पर जोर देता है, लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है। क्योंकि ये चीजें राजनीति के माध्यम से नहीं होतीं। मुझे यह कहने में खेद है, लेकिन तथ्य यह है कि राजनीति अब स्वार्थ का खेल बन गई है। जहां ‘मैं’ और ‘मेरा’ है, वहां कोई समाधान नहीं है। ‘हम’ और ‘हमारा’ ही समाधान है। इसलिए भारत में हमारा अनुभव है कि हमें समाज से शुरुआत करनी होगी।”

छोटे प्रयासों से बड़ा बदलाव लाने का आह्वान

RSS प्रमुख ने सामाजिक एकता और निस्वार्थ सेवा के प्रयास स्थानीय स्तर से शुरू करने की बात कही। उन्होंने कहा कि छोटे-छोटे समूह यदि मिलकर सेवा और एकता का वातावरण तैयार करें तो आगे चलकर इन्हें आपस में जोड़कर व्यापक स्तर पर बड़ा नेटवर्क बनाया जा सकता है।

उन्होंने कहा, “आज हम जो भी करने का निर्णय लें, हमें इसकी शुरुआत अपने देश से करनी चाहिए और निस्वार्थ सेवा के ऐसे छोटे-छोटे केंद्र तथा एकता का ऐसा वातावरण तैयार करना चाहिए। इसके बाद यह संवाद जारी रहना चाहिए। इस संवाद के माध्यम से हमें उन्हें जोड़ना चाहिए और फिर इसका विस्तार करना चाहिए।”

तीन दशक बाद भी याद है चर्खी दादरी की त्रासदी

चर्खी दादरी विमान हादसे को करीब 30 वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन कुछ ही क्षणों में 349 लोगों की जान लेने वाली उस त्रासदी की भयावहता आज भी इतिहास में दर्ज है। न्यूयॉर्क में मोहन भागवत ने हादसे को केवल मौत और तबाही के रूप में याद करने के बजाय दुर्घटना के बाद सामने आई मानवीय सेवा को अपने संदेश का केंद्र बनाया।

उनके अनुसार, मलबे और तबाही के बीच स्वयंसेवकों ने उन लोगों की मदद के लिए कदम बढ़ाया, जिन्हें वे जानते तक नहीं थे। घायलों की सहायता, शवों को निकालने और परिजनों को उनके प्रियजनों की पहचान में मदद करने से लेकर अंतिम संस्कार की व्यवस्था तक स्वयंसेवकों ने सहयोग किया।

भागवत के संदेश का मूल भाव यही रहा कि गहरे मानवीय संकट के क्षणों में सेवा व्यक्ति की धार्मिक या सामाजिक पहचान देखकर नहीं, बल्कि उसकी जरूरत देखकर की जानी चाहिए।


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