हल्द्वानी दंगा केस: सुप्रीम कोर्ट ने रद्द की डिफॉल्ट जमानत, आरोपियों को सरेंडर का आदेश

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Lucknow, 5 May, 2026 11:45 PM
हल्द्वानी दंगा केस: सुप्रीम कोर्ट ने रद्द की डिफॉल्ट जमानत, आरोपियों को सरेंडर का आदेश

देहरादून/नई दिल्ली, 4 मई 2026। हल्द्वानी के बनभूलपुरा दंगा मामले में उत्तराखंड सरकार को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। शीर्ष अदालत ने नैनीताल हाईकोर्ट द्वारा दो मुख्य आरोपियों जावेद सिद्दीकी और अरशद अयूब को दी गई डिफॉल्ट जमानत को रद्द करते हुए उन्हें दो सप्ताह के भीतर ट्रायल कोर्ट में आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया है।


यह आदेश न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने उत्तराखंड सरकार की विशेष अनुमति याचिका (SLP) पर सुनवाई करते हुए दिया। राज्य सरकार की ओर से उप महाधिवक्ता जतिंदर कुमार सेठी और स्टैंडिंग काउंसिल आशुतोष कुमार शर्मा ने पक्ष रखा, जबकि आरोपियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ अग्रवाल ने दलीलें पेश कीं।


सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट के फैसले पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि मामला अत्यंत गंभीर प्रकृति का है और हाईकोर्ट इस मामले में “पूरी तरह गलत दिशा में चला गया।” कोर्ट ने कहा कि यह घटना व्यापक हिंसा, आगजनी और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने से जुड़ी है, जिसमें पुलिस स्टेशन को भी निशाना बनाया गया था।


गौरतलब है कि 8 फरवरी 2024 को हल्द्वानी के बनभूलपुरा क्षेत्र में भड़की हिंसा के दौरान उपद्रवियों ने फायरिंग, पथराव, पेट्रोल बमबाजी और पुलिस वाहनों को आग के हवाले करने जैसी घटनाओं को अंजाम दिया था। इतना ही नहीं, महिला कांस्टेबलों को पुलिस स्टेशन के अंदर बंद कर दिया गया और बाद में थाने में भी आग लगा दी गई थी। इस मामले में आईपीसी की विभिन्न धाराओं के साथ ही यूएपीए की धारा 15 व 16 और आर्म्स एक्ट की धाराओं में तीन अलग-अलग एफआईआर दर्ज की गई थीं।


सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि हाईकोर्ट द्वारा जांच प्रक्रिया पर की गई टिप्पणियां तथ्यात्मक रूप से गलत थीं और जांच एजेंसी ने मामले की गंभीरता के बावजूद तेजी और दक्षता के साथ जांच को आगे बढ़ाया। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि आरोपियों ने समय रहते समय विस्तार और जमानत खारिज किए जाने के आदेशों को चुनौती नहीं दी, बल्कि करीब दो महीने बाद अपील दायर की, जिससे उन्होंने डिफॉल्ट जमानत का अधिकार खो दिया।


अदालत ने स्पष्ट निर्देश दिए कि यदि आरोपी निर्धारित समय में आत्मसमर्पण नहीं करते हैं तो ट्रायल कोर्ट उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई सुनिश्चित करे।


राज्य अभियोजन विभाग ने इस फैसले को बड़ी कानूनी जीत बताया है। विभाग का कहना है कि यह मामला राज्य की कानून-व्यवस्था पर सीधे हमले से जुड़ा था और सुप्रीम कोर्ट द्वारा जांच की सराहना से पुलिस बल का मनोबल भी बढ़ा है।


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