भानियावाला–जॉलीग्रांट–ऋषिकेश फोर/सिक्स लेन परियोजना में पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण पर विशेष जोर, ₹743 करोड़ से बनेगा आधुनिक हाईवे

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Lucknow, 7 Jul, 2026 09:14 PM
भानियावाला–जॉलीग्रांट–ऋषिकेश फोर/सिक्स लेन परियोजना में पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण पर विशेष जोर, ₹743 करोड़ से बनेगा आधुनिक हाईवे

देहरादून। भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) उत्तराखंड में भानियावाला–जॉलीग्रांट–ऋषिकेश फोर/सिक्स लेन परियोजना (एनएच-07) को आधुनिक, सुरक्षित और पर्यावरण-अनुकूल राजमार्ग के रूप में विकसित कर रहा है। करीब 20 किलोमीटर लंबी इस परियोजना का निर्माण 743 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत से हाइब्रिड एन्युटी मोड (HAM) के तहत किया जा रहा है। परियोजना पूरी होने के बाद देहरादून, जॉलीग्रांट एयरपोर्ट और ऋषिकेश के बीच कनेक्टिविटी बेहतर होगी तथा चारधाम यात्रा, पर्यटन और स्थानीय यातायात को बड़ी राहत मिलेगी।


बढ़ते यातायात को देखते हुए चौड़ीकरण जरूरी


एनएचएआई के अनुसार, वन क्षेत्र से गुजरने वाले मौजूदा दो-लेन मार्ग पर प्रतिदिन लगभग 18,456 वाहनों का आवागमन होता है, जो करीब 15,088 पैसेंजर कार यूनिट (PCU) के बराबर है। जॉलीग्रांट एयरपोर्ट पर बढ़ती आवाजाही, पर्यटन गतिविधियों और चारधाम यात्रा के कारण भविष्य में यातायात और बढ़ने की संभावना है। मौजूदा सड़क पर कई तीखे मोड़ और भारी वाहनों की लगातार आवाजाही के कारण जाम और दुर्घटनाओं का खतरा बना रहता है। ऐसे में सड़क का चौड़ीकरण आवश्यक माना गया है।


पर्यावरण संरक्षण के लिए डिजाइन में बड़ा बदलाव


परियोजना में पर्यावरणीय प्रभाव को कम करने के लिए एनएचएआई ने पारंपरिक डिजाइन में महत्वपूर्ण बदलाव किए हैं। सामान्यतः राष्ट्रीय राजमार्ग के लिए 60 मीटर राइट ऑफ वे (ROW) निर्धारित होता है, लेकिन वन क्षेत्र में इसे घटाकर केवल 23 मीटर रखा गया है। इससे सड़क सुरक्षा मानकों से समझौता किए बिना पेड़ों की कटाई को काफी हद तक सीमित किया जा सकेगा।


इसके अलावा फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट (FRI) के वैज्ञानिक आकलन के आधार पर 754 पेड़ों को प्रतिरोपण (ट्रांसप्लांटेशन) के लिए उपयुक्त चिन्हित किया गया है। इन पेड़ों का प्रतिरोपण आगामी मानसून के दौरान किया जाएगा।


वन्यजीव संरक्षण परियोजना की प्रमुख प्राथमिकता


यह परियोजना बड़कोट, ऋषिकेश और थानो वन रेंज जैसे पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों से होकर गुजरती है। इसी कारण एनएचएआई ने उत्तराखंड वन विभाग, WWF-India और भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII), देहरादून के तकनीकी सहयोग से परियोजना में कई विशेष वन्यजीव संरक्षण उपाय शामिल किए हैं।


इनमें शामिल हैं—


  • एक प्रमुख ब्रिज-कम-एलीफेंट अंडरपास
  • चार समर्पित एलीफेंट अंडरपास
  • ग्रीन गाइड हेज
  • साउंड बैरियर
  • एंटी-ग्लेयर स्क्रीन
  • वन्यजीव चेतावनी संकेतक
  • स्पीड कैल्मिंग उपाय
  • निर्धारित नो हॉर्न जोन


इन उपायों का उद्देश्य वन्यजीवों की प्राकृतिक आवाजाही बनाए रखना और मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करना है।


पांच वर्षों में 29 वन्यजीवों की हुई मौत


वन विभाग के रिकॉर्ड के अनुसार, मौजूदा दो-लेन मार्ग पर ऋषिकेश और बड़कोट वन रेंज के बीच पिछले पांच वर्षों में सड़क दुर्घटनाओं में 29 वन्यजीवों की मौत दर्ज की गई है। इसे देखते हुए परियोजना में करीब 3.5 किलोमीटर लंबी एलिवेटेड संरचना और विशेष एलीफेंट अंडरपास बनाए जा रहे हैं, जिससे हाथियों समेत अन्य वन्यजीवों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित हो सके।


सभी कानूनी और पर्यावरणीय मंजूरियों के बाद शुरू हुआ कार्य


एनएचएआई ने स्पष्ट किया है कि परियोजना सभी आवश्यक वैधानिक एवं पर्यावरणीय अनुमतियां मिलने के बाद शुरू की गई है। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने WP (PIL) संख्या 37/2025 की सुनवाई के दौरान यह स्पष्ट किया था कि पेड़ों की कटाई पर कोई प्रभावी रोक लागू नहीं है। इसके बाद राज्य सरकार ने निर्धारित पर्यावरणीय शर्तों के तहत पेड़ों की कटाई और प्रतिरोपण के लिए आवश्यक वर्किंग परमिशन जारी की। एनएचएआई सभी कानूनी एवं पर्यावरणीय प्रावधानों का पालन करते हुए परियोजना का निर्माण कर रहा है।


परियोजना पूरी होने पर होंगे ये प्रमुख लाभ


परियोजना के पूर्ण होने के बाद देहरादून, जॉलीग्रांट एयरपोर्ट और ऋषिकेश के बीच आवागमन अधिक तेज़ और सुरक्षित होगा। चारधाम यात्रियों, पर्यटकों और स्थानीय लोगों को बेहतर सड़क सुविधा मिलेगी। यात्रा का समय कम होगा, जाम में कमी आएगी और सड़क सुरक्षा में सुधार होगा। साथ ही भविष्य में बढ़ने वाले यातायात को भी सुचारु रूप से संचालित किया जा सकेगा। एलीफेंट अंडरपास और अन्य संरक्षण उपायों के माध्यम से वन्यजीवों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित होगी तथा आधारभूत ढांचे के विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित किया जाएगा।


एनएचएआई का कहना है कि भानियावाला–जॉलीग्रांट–ऋषिकेश फोर/सिक्स लेन परियोजना आधुनिक इंजीनियरिंग, पर्यावरणीय संवेदनशीलता और सतत विकास का एक महत्वपूर्ण उदाहरण होगी, जो उत्तराखंड की भविष्य की परिवहन आवश्यकताओं को पूरा करने के साथ-साथ वन एवं वन्यजीव संरक्षण की दिशा में भी अहम भूमिका निभाएगी।

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