दिल्ली-दून एक्सप्रेसवे का वाइल्ड लाइफ कॉरिडोर बनेगा वन्यजीवों का सुरक्षा कवच
दिल्ली-दून एक्सप्रेस वे पर बने एलिवेटेड कारिडोर की हैं तमाम खासियत 12 किलोमीटर लंबा है वाइल्ड लाइफ एलिवेटेड कारिडोर 20 किलोमीटर वन क्षेत्र शामिल है एक्सप्रेस वे प्रोजेक्ट में 40 करोड़ के अतिरिक्त बजट से हो रहे हैं महत्वपूर्ण कार्य 19 प्रतिशत ईंधन की बचत का लगाया गया है अनुमान
YUGVARTA NEWS
Lucknow, 13 Apr, 2026 07:13 PMदेहरादून, 13 अप्रैल: वन मंत्री सुबोध उनियाल ने कहा कि दिल्ली-दून एक्सप्रेसवे पर निर्मित 12 किलोमीटर लंबा एलिवेटेड वाइल्ड लाइफ कॉरिडोर वन्यजीवों के लिए सुरक्षा कवच साबित होगा। यह कॉरिडोर न केवल वन्यजीवों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करेगा, बल्कि मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। इसे विकास और पर्यावरण संरक्षण के संतुलन का उत्कृष्ट उदाहरण माना जा रहा है।
सोमवार को वन मुख्यालय में आयोजित प्रेस वार्ता में वन मंत्री ने बताया कि दिल्ली-दून एक्सप्रेसवे का अंतिम 20 किलोमीटर हिस्सा उत्तर प्रदेश के शिवालिक वन प्रभाग और उत्तराखंड के राजाजी टाइगर रिजर्व व देहरादून वन प्रभाग के घने वन क्षेत्रों से होकर गुजरता है। ऐसे संवेदनशील क्षेत्र में आधुनिक तकनीक के साथ पर्यावरण संरक्षण को प्राथमिकता देते हुए यह परियोजना विकसित की गई है।
उन्होंने कहा कि इस राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजना के तहत एशिया का सबसे लंबा लगभग 12 किलोमीटर का एलिवेटेड वाइल्ड लाइफ कॉरिडोर बनाया गया है। इसमें हाथियों के लिए विशेष अंडरपास तथा अन्य वन्यजीवों के लिए सुरक्षित मार्ग तैयार किए गए हैं, जिससे उनकी निर्बाध आवाजाही संभव हो सके।
वन मंत्री ने बताया कि निर्माण कार्य के दौरान वन्यजीवों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई। इसके लिए साउंड बैरियर और लाइट बैरियर जैसी व्यवस्थाएं की गई हैं, ताकि शोर और प्रकाश प्रदूषण का वन्यजीवों पर न्यूनतम प्रभाव पड़े।
उन्होंने जानकारी दी कि उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में परियोजना के अंतर्गत वन भूमि हस्तांतरण के बदले 165.5 हेक्टेयर क्षेत्र में प्रतिपूरक वृक्षारोपण किया गया है, जिसमें करीब 1.95 लाख पौधे लगाए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट मॉनिटरिंग कमेटी के निर्देशन में 40 करोड़ रुपये की अतिरिक्त धनराशि से वन एवं वन्यजीव संरक्षण हेतु इको-रेस्टोरेशन के विभिन्न कार्य भी किए जा रहे हैं।
सुबोध उनियाल ने कहा कि इस कॉरिडोर के निर्माण से विभिन्न वन्यजीव प्रजातियों के बीच आनुवंशिक आदान-प्रदान बेहतर होगा, जो जैव विविधता संरक्षण के लिए बेहद जरूरी है। साथ ही आने वाले 20 वर्षों में 240 मिलियन टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में कमी आने का अनुमान है, जो 60 से 68 लाख पेड़ों द्वारा कार्बन अवशोषण के बराबर है। इसके अलावा 19 प्रतिशत ईंधन की बचत भी होगी।
उन्होंने कहा कि यह परियोजना यात्रा समय कम करेगी, पर्यटन और व्यापार को बढ़ावा देगी तथा स्थानीय रोजगार के नए अवसर भी सृजित करेगी, जिससे क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी।
तकनीक से बचे 33,840 पेड़
वन मंत्री ने बताया कि परियोजना के शुरुआती चरण में 45 हजार पेड़ काटने की आवश्यकता जताई गई थी, लेकिन वैज्ञानिकों और आधुनिक तकनीक के बेहतर उपयोग से 33,840 पेड़ों को कटने से बचा लिया गया। अंततः केवल 11,160 पेड़ ही काटने पड़े।
प्रेस वार्ता में वन विभाग के पीसीसीएफ (हॉफ) आर.के. मिश्रा सहित अन्य वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे।


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