आपदा प्रबंधन में साथ मिलकर काम करेंगे उत्तराखंड और हिमाचल, अनुभव साझा करेंगे दोनों राज्य
YUGVARTA NEWS
Lucknow, 20 Apr, 2026 08:31 PMदेहरादून: उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश ने आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में आपसी सहयोग को और मजबूत करने पर सहमति जताई है। दोनों राज्यों ने तय किया है कि पर्वतीय भौगोलिक परिस्थितियों और समान प्राकृतिक चुनौतियों को देखते हुए एक-दूसरे के अनुभवों, नवाचारों और कार्य प्रणालियों से सीखते हुए संयुक्त रूप से कार्य किया जाएगा।
यह सहमति सोमवार को हिमाचल प्रदेश के अपर मुख्य सचिव कमलेश कुमार पंत के उत्तराखंड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (USDMA) दौरे के दौरान बनी। इस मौके पर सचिव आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास विनोद कुमार सुमन ने उत्तराखंड में आपदा न्यूनीकरण, पूर्व तैयारी, त्वरित राहत एवं बचाव, जोखिम आकलन और जनजागरूकता के लिए किए जा रहे कार्यों की विस्तृत जानकारी दी।
कमलेश कुमार पंत ने कहा कि उत्तराखंड और हिमाचल दोनों ही भौगोलिक दृष्टि से संवेदनशील राज्य हैं, जहां भूस्खलन, अतिवृष्टि, बादल फटना, बाढ़ और भूकंप जैसी आपदाएं लगातार सामने आती रहती हैं। ऐसे में दोनों राज्यों के बीच अनुभवों का आदान-प्रदान बेहद जरूरी है, जिससे आपदाओं के प्रभाव को कम किया जा सके।
उन्होंने उत्तराखंड में स्थापित उत्तराखंड भूस्खलन न्यूनीकरण एवं प्रबंधन केंद्र की सराहना करते हुए हिमाचल प्रदेश में भी इसी तरह की व्यवस्था स्थापित करने की इच्छा जताई। इसके लिए उत्तराखंड से तकनीकी सहयोग का अनुरोध भी किया गया। साथ ही उत्तराखंड द्वारा विकसित भूदेव एप और भूस्खलन रोकथाम प्रणालियों की भी सराहना की गई।
बैठक में आपदा के समय त्वरित संचार और सूचना आदान-प्रदान की आवश्यकता पर जोर दिया गया। रुद्रप्रयाग जिले में विकसित डीडीआरएन प्रणाली की सराहना करते हुए इसे अन्य क्षेत्रों में लागू करने की संभावनाओं पर भी चर्चा हुई।
हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ते हिमनद झील विस्फोट बाढ़ (GLOF) के खतरे को देखते हुए दोनों राज्यों ने इस दिशा में साझा रणनीति बनाने पर बल दिया। विनोद कुमार सुमन ने कहा कि हिमनद झीलों की निगरानी, समय रहते चेतावनी और जोखिम न्यूनीकरण के उपायों को और मजबूत बनाने के लिए आपसी सहयोग जरूरी है।
बैठक में पहाड़ी क्षेत्रों में भूकंपरोधी भवन निर्माण तकनीक पर भी सहयोग बढ़ाने पर सहमति बनी। दोनों राज्यों ने माना कि सुरक्षित निर्माण तकनीकों को बढ़ावा देकर जनधन की हानि को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग को औपचारिक रूप देने के लिए भविष्य में समझौता ज्ञापन (MoU) किए जाने का भी निर्णय लिया गया, ताकि ज्ञान, तकनीक, प्रशिक्षण और संसाधनों का प्रभावी आदान-प्रदान सुनिश्चित हो सके।


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