जल संकट पर उत्तर प्रदेश का महाअभियान, अब ‘अपशिष्ट’ नहीं बनेगा पानी
उपचारित जल पुनः उपयोग नीति अधिसूचना के अंतिम चरण में, उद्योग से कृषि तक बदलेगा जल प्रबंधन का पूरा खेल
YUGVARTA NEWS
Lucknow, 17 Mar, 2026 06:17 PMलखनऊ, 17 मार्च 2026: वैश्विक जल संकट के दौर में उत्तर प्रदेश ने अब उस मोर्चे पर निर्णायक बढ़त बनानी शुरू कर दी है, जिसे लंबे समय तक नीतियों में तो जगह मिली, लेकिन जमीनी प्राथमिकता नहीं। तेजी से बढ़ती शहरी आबादी, गिरते भूजल स्तर, नदियों पर बढ़ते प्रदूषण दबाव और मीठे पानी के स्रोतों पर बेकाबू निर्भरता के बीच उत्तर प्रदेश उपचारित अपशिष्ट जल के सुरक्षित पुनः उपयोग को एक बड़े संरचनात्मक बदलाव के रूप में सामने ला रहा है। राज्य की उपचारित जल के सुरक्षित पुन: उपयोग की नीति अब अधिसूचना के अंतिम चरण में पहुंच चुकी है।
सरकार का यह कदम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि राज्य अब उपचारित जल को निस्तारण की मजबूरी नहीं, बल्कि विकास की अनिवार्य पूंजी के रूप में स्थापित करने की दिशा में बढ़ रहा है। अब तक सीवेज ट्रीटमेंट के बाद बड़ी मात्रा में पानी नदियों में छोड़ दिया जाता था, जबकि वही जल उद्योग, ऊर्जा, सिंचाई, निर्माण, शहरी हरितीकरण और फ्लशिंग जैसे गैर-पेय उपयोगों में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हो सकता है। नई नीति इसी सोच को संस्थागत ढांचा देने जा रही है।
इस पूरी प्रक्रिया को केंद्रीय स्तर पर भी मजबूत समर्थन मिला है। केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सी.आर. पाटिल ने सशक्त कार्यबल की बैठकों में नियमित समीक्षा के जरिए उपचारित जल के पुनः उपयोग को राष्ट्रीय जल सुरक्षा एजेंडा के केंद्र में रखा है। नीति सुधार, शहर-स्तरीय रणनीति, और उद्योग, कृषि व ऊर्जा क्षेत्रों में उपचारित जल की खपत बढ़ाने पर दिया गया उनका लगातार जोर उत्तर प्रदेश के लिए गति, दिशा और संस्थागत स्पष्टता तीनों लेकर आया है। अधिसूचना के बाद यह नीति उत्तर प्रदेश में उपचारित अपशिष्ट जल के पुनः उपयोग के लिए एक स्पष्ट नियामक ढांचा उपलब्ध कराएगी। इसमें गैर-पेय उपयोगों को बढ़ावा देने के साथ-साथ शहरी स्थानीय निकायों, विभागों, उद्योगों और अन्य संबंधित संस्थाओं की भूमिकाएं स्पष्ट रूप से तय होंगी।
राज्य सरकार ने इस नीति को कागजों तक सीमित नहीं रखा है। शहर-स्तर पर सिटी-लेवल रीयूज एक्शन प्लान तैयार कर उत्तर प्रदेश ने संकेत दे दिया है कि उपचारित जल पुनः उपयोग अब नारेबाजी नहीं, बल्कि माइक्रो-लेवल प्लानिंग के साथ लागू होने वाली वास्तविक कार्ययोजना है। प्रयागराज और आगरा अपने सिटी-लेवल रीयूज एक्शन प्लान तैयार कर चुके हैं, वाराणसी अंतिम चरण में है और कानपुर में प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। यह प्रगति बताती है कि उत्तर प्रदेश अब बड़े शहरी केंद्रों में ट्रीटेड वॉटर रीयूज को संरचित, मापनीय और परिणाम-उन्मुख कार्यक्रम के रूप में स्थापित करना चाहता है।
उत्तर प्रदेश में नीति-स्तर की तेज़ी, शहर-स्तरीय तैयारी और औद्योगिक उपयोग के ठोस उदाहरण एक बड़े बदलाव की ओर इशारा करते हैं. यह बदलाव केवल इतना नहीं कि मीठे पानी का दबाव कम होगा या नदियों में गंदे जल का बोझ घटेगा। असली बदलाव यह है कि राज्य अब जल को रैखिक उपभोग की वस्तु नहीं, बल्कि पुनर्चक्रित संसाधन के रूप में देखने लगा है।
स्पष्ट है कि उत्तर प्रदेश अब जल प्रबंधन के पारंपरिक ढांचे से बाहर निकल चुका है। जहां पहले अपशिष्ट जल को बोझ माना जाता था, वहां अब उसे विकास का इंजन बनाने की तैयारी है। उपचारित जल के सुरक्षित पुन: उपयोग के नीति की अधिसूचना के अंतिम चरण में पहुंचना महज एक प्रशासनिक प्रगति नहीं, बल्कि यह घोषणा है कि उत्तर प्रदेश जल संकट से लड़ाई में अब रक्षात्मक नहीं, बल्कि आक्रामक रणनीति के साथ मैदान में उतर चुका है।
प्रयागराज इस बदलाव का बड़ा उदाहरण बनकर उभर रहा है। यहां लगभग 340 MLD क्षमता वाले 10 सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट संचालित हैं, लेकिन उपचारित जल का पुनः उपयोग अब तक सीमित रहा है। अब नैनी, राजापुर और कोडरा STP से उद्योगों और रेलवे को जल आपूर्ति की योजनाओं के जरिए 126 MLD से अधिक ट्रीटेड वॉटर रीयूज की क्षमता विकसित की जा रही है, जो प्रयागराज को पुनर्चक्रित जल आधारित शहरी प्रबंधन का मजबूत मॉडल बना सकती है।
*आगरा* भी इस बदलाव का अहम केंद्र बनकर उभर रहा है। करीब 286 MLD सीवेज वाले आगरा में उपचार क्षमता 221 MLD से बढ़ाकर लगभग 398 MLD की जा रही है। धांधूपुरा, जगनपुर और बिछपुरी STP से रेलवे, मेट्रो कॉरिडोर और कीठम झील के लिए लगभग 28 MLD उपचारित जल पुनः उपयोग की योजना इस बात का संकेत है कि आगरा अब जल संकट का समाधान नए स्रोतों में नहीं, बल्कि उपलब्ध जल के दोबारा उपयोग में खोज रहा है।
*कानपुर* ने उपचारित जल के पुनः उपयोग के क्षेत्र में एक ठोस और व्यवहारिक मॉडल पेश किया है। नमामि गंगे मिशन के तहत विकसित बिनगवां स्थित 30 एमएलडी एसटीपी शहर का पहला उन्नत हाइब्रिड एन्युटी मॉडल आधारित संयंत्र है, जो सीक्वेंशियल बैच रिएक्टर तकनीक पर काम करता है। जून 2023 से संचालित यह प्लांट लगातार पूर्ण क्षमता पर कार्यरत है और आधुनिक, स्वचालित प्रणाली के जरिए अपशिष्ट जल का प्रभावी उपचार कर रहा है। उपचारित जल को निर्धारित मानकों के अनुरूप पांडु नदी में छोड़ा जा रहा है, जिससे गंगा पर प्रदूषण भार कम हो रहा है। साथ ही यह जल डाउनस्ट्रीम कृषि उपयोग को भी सहारा दे रहा है, जो इसकी आर्थिक उपयोगिता को रेखांकित करता है। इससे आगे बढ़कर पनकी तापीय विद्युत संयंत्र लगभग 40 एमएलडी उपचारित जल का उपयोग कर रहा है।


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