संपदा कार्यक्रम' से सहेजी जा रही लोक विरासत, यूपी के विलुप्त गीतों को मिली नई जिंदगी

लोकधरोहर के संरक्षण में बड़ी पहल, 'संपदा' से बन रहा सांस्कृतिक आर्काइव *यूपी की विलुप्त होती विरासत को सहेजना हमारी प्राथमिकता : जयवीर सिंह

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Lucknow, 10 Apr, 2026 06:39 PM
संपदा कार्यक्रम' से सहेजी जा रही लोक विरासत, यूपी के विलुप्त गीतों को मिली नई जिंदगी

लखनऊ, 10 अप्रैल 2026: यूपी की समृद्ध लोक परंपराओं को सहेजने और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के तहत *'संपदा कार्यक्रम'* के जरिए विलुप्त होते पारंपरिक लोकगीतों का व्यवस्थित अभिलेखीकरण किया जा रहा है। उत्तर प्रदेश लोक एवं जनजाति संस्कृति संस्थान और उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी के संयुक्त प्रयास से चल रहा यह अभियान न केवल सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित कर रहा है, बल्कि 60 वर्ष से ज्यादा उम्र वाले लोक कलाकारों को एक नया मंच भी प्रदान कर रहा है। इस पहल के अंतर्गत प्रदेश के विभिन्न जिलों से जुड़े कलाकारों को आमंत्रित कर उनके गीतों, अनुभवों और सांस्कृतिक ज्ञान को रिकॉर्ड किया जा रहा है। मिर्जापुर के मोहन बिन्द द्वारा प्रस्तुत ‘विजयमल’ जैसी विलुप्त होती लोकगाथा हो या वाराणसी के स्वर्गीय हरेराम द्विवेदी के यात्रा और संस्कार गीत-हर प्रस्तुति अपने आप में एक अमूल्य सांस्कृतिक दस्तावेज बनती जा रही है। प्रयागराज के उदय चंद्र परदेसी द्वारा विवाह, देवी, गर्भाधान, मुंडन और जनेऊ जैसे संस्कार गीतों का अभिलेखीकरण किया गया, वहीं पद्मश्री अजीता श्रीवास्तव ने कजरी लोक गायन की परंपरा को जीवंत किया। लखनऊ की रंजना मिश्रा ने गंगा से जुड़े लोकगीतों की प्रस्तुति देकर इस पहल को और समृद्ध बनाया। इन प्रस्तुतियों के माध्यम से लोकजीवन की विविधता और उसकी गहराई स्पष्ट रूप से सामने आ रही है। बलरामपुर के धनिराम चौधरी द्वारा थारु जनजाति के विलुप्त होते लोकगीतों का संरक्षण, गोरखपुर के रामज्ञान यादव, सुमित्रा देवी और सैलाबी देवी द्वारा रोपनी और सोहनी गीतों का अभिलेखीकरण, तथा अंबेडकर नगर की महेंद्र देवी की प्रस्तुतियां इस अभियान को और व्यापक बनाती हैं। उन्नाव के ओंकार नाथ अवस्थी द्वारा आल्हा लोक गायन और लखनऊ के कलाकारों द्वारा अवधी लोक परंपराओं को भी इसमें शामिल किया गया है। 'संपदा कार्यक्रम' की खास बात यह है कि यह केवल रिकॉर्डिंग तक सीमित नहीं है, बल्कि यह लोक कलाकारों के अनुभव, उनके जीवन संघर्ष और परंपरागत ज्ञान को भी सहेज रहा है। इससे जहां एक ओर लुप्त होती विधाओं को नई पहचान मिल रही है, वहीं दूसरी ओर युवा पीढ़ी को अपनी जड़ों से जुड़ने का अवसर भी मिल रहा है। यह पहल न केवल उत्तर प्रदेश की लोक परंपराओं को संरक्षित कर रही है, बल्कि देश और दुनिया के सामने भारतीय लोक संस्कृति की समृद्धता को भी प्रभावी ढंग से प्रस्तुत कर रही है। आने वाले समय में ‘संपदा’ कार्यक्रम लोक विरासत को सहेजने की एक मजबूत और प्रेरणादायक पहल के रूप में स्थापित होगा। इस पर *पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जयवीर सिंह* ने बताया कि, संपदा कार्यक्रम के माध्यम से हम अपनी लोक परंपराओं और विरासत को न केवल सहेज रहे हैं, बल्कि उन्हें नई पीढ़ी से जोड़ने का सशक्त प्रयास भी कर रहे हैं। लोक कलाकारों की आवाज और उनके अनुभव हमारी सांस्कृतिक पहचान की आत्मा हैं, जिन्हें संरक्षित करना हमारी प्राथमिकता है।

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